क्रान्तिवीर बालक शिवा झा जन्म 1930 मृत्यू 1942
गुरुवार, 27 मार्च 2014
बुधवार, 26 फ़रवरी 2014
***व्याकरणकी मजेदार बातें 4 देवपुत्र 2014
व्याकरणकी मजेदार बातें 4 देवपुत्र 2014
March 2014
व्याकरण की मजेदार बातें (भाग ४)
-लीना मेहेंदले
मित्रो, हम अपनी इस व्याकरण की कड़ी में शब्दों के विषय में कुछ सीखेंगे।यह सदा स्मरण रहे कि मनुष्य ने पहले बोलना सीखा तत्पश्चात लिखनां सीखा। इसलिए हम भी पहलेशब्दों को पढ़ेगे, बाद में लिपी, वर्णमालाऔर अक्षरोंको।
शब्दों का वर्गीकरण हम इस प्रकार करते हैं- संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रियापद (क्रिया), क्रियाविशेषण , अत्यय।इसमें से अत्ययों के तीन प्रकार बताए गए हैं- केवल प्रयोगी, उभयात्ययीऔर विस्मयादिबोधक।यह वर्गीकरण संस्कृत, हिन्दीसहित भारत की सभी भाषाओं पर लागू है और अंग्रेजी सहित सारी यूरोपीय भाषाओं पर भी।मेरे बच्चे जब शाला में पढ़ते थे तब मैंने उन्हें संज्ञा की परिभाषा ऐसे पढ़ाई थी- किसी व्यक्ति, जाति, वस्तु या भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं, जैसे राम, घोड़ा, पानी, भलाईइत्यादि।आज तक हम लोग कभी-कभी इस वाक्य को कोरस में गाकर ऐसा मजा लूटते हैं। खैर! और बोलचाल में बार-बार संज्ञा को दोहराने से वाक्य की सुन्दरता में बाधा आती है इसलिए हम सर्वनाम का उपयोग करते हैं।जैसे, राम पेड़ पर चढ़ा वहाँ से उसने दूर तक देखा।इस वाक्य से हम समझ जाते हैं कि “उसने” शब्द राम के लिए है जबकि “वहाँ” शब्द से ‘पेड़के ऊपर’ का बोध होता है।तो व्याकरण की आधी पढ़ाई तो शब्दोंके भेद और उनकेप्रयोग समझने से हो ही जाती है। सर्वनामों के साथ ‘पुरुष’ नामक एक संकल्पना जुड़ी है।बात करनेवाला जब अपने स्वयं के संबंधमेंकुछ कहना चाहता है तो वह अपने लिए “मैं” शब्द का प्रयोग करता है।संस्कृत में “अहं” शब्द का प्रयोग होता है।जैसे मैं जाती हूँ, मैंनेपुस्तक पढ़ी।बात सुनने वाले के संबंध में कुछ कहना हो तो ‘तुम’ या संस्कृतमें ‘त्वम्’ शब्द का प्रयोग होता है और इन दोनों से परे किसी व्यक्तिया वस्तु की बात करनीहो तो “वह” शब्द इस्तेमाल करते हैं।तो “मैं”, “तुम” और “वह” को क्रमशः उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष, प्रथम पुरुष, कहते हैं।लेकिन स्मरण रहे किअंग्रेजी में I, You, और He के लिए First Second और Third person कहा गया है। कभी-कभी हिन्दी में भी उसी को दोहराते हुए कोई कह बैठता हैप्रथम पुरुष, द्वितीय पुरुष और तृतीय पुरुषऔर इस कारण गलती की संभावना बढ़ जाती है।तो हम जो व्याकरण की बात करेंगेउसमें उत्तम , माध्यम, और प्रथम पुरुष हिन्हीं शब्दों का
प्रयोग करेंगे।पुरुष के अलावा संज्ञा और सर्वनामों में एक वचन, द्विवचन और बहुवचन का भेद भी होता है। जिस कारण शब्द का रुप बदल जाता है।ये मजेदार बातें अगली कड़ी में करेंगे।
March 2014
व्याकरण की मजेदार बातें (भाग ४)
-लीना मेहेंदले
मित्रो, हम अपनी इस व्याकरण की कड़ी में शब्दों के विषय में कुछ सीखेंगे।यह सदा स्मरण रहे कि मनुष्य ने पहले बोलना सीखा तत्पश्चात लिखनां सीखा। इसलिए हम भी पहलेशब्दों को पढ़ेगे, बाद में लिपी, वर्णमालाऔर अक्षरोंको।
शब्दों का वर्गीकरण हम इस प्रकार करते हैं- संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रियापद (क्रिया), क्रियाविशेषण , अत्यय।इसमें से अत्ययों के तीन प्रकार बताए गए हैं- केवल प्रयोगी, उभयात्ययीऔर विस्मयादिबोधक।यह वर्गीकरण संस्कृत, हिन्दीसहित भारत की सभी भाषाओं पर लागू है और अंग्रेजी सहित सारी यूरोपीय भाषाओं पर भी।मेरे बच्चे जब शाला में पढ़ते थे तब मैंने उन्हें संज्ञा की परिभाषा ऐसे पढ़ाई थी- किसी व्यक्ति, जाति, वस्तु या भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं, जैसे राम, घोड़ा, पानी, भलाईइत्यादि।आज तक हम लोग कभी-कभी इस वाक्य को कोरस में गाकर ऐसा मजा लूटते हैं। खैर! और बोलचाल में बार-बार संज्ञा को दोहराने से वाक्य की सुन्दरता में बाधा आती है इसलिए हम सर्वनाम का उपयोग करते हैं।जैसे, राम पेड़ पर चढ़ा वहाँ से उसने दूर तक देखा।इस वाक्य से हम समझ जाते हैं कि “उसने” शब्द राम के लिए है जबकि “वहाँ” शब्द से ‘पेड़के ऊपर’ का बोध होता है।तो व्याकरण की आधी पढ़ाई तो शब्दोंके भेद और उनकेप्रयोग समझने से हो ही जाती है। सर्वनामों के साथ ‘पुरुष’ नामक एक संकल्पना जुड़ी है।बात करनेवाला जब अपने स्वयं के संबंधमेंकुछ कहना चाहता है तो वह अपने लिए “मैं” शब्द का प्रयोग करता है।संस्कृत में “अहं” शब्द का प्रयोग होता है।जैसे मैं जाती हूँ, मैंनेपुस्तक पढ़ी।बात सुनने वाले के संबंध में कुछ कहना हो तो ‘तुम’ या संस्कृतमें ‘त्वम्’ शब्द का प्रयोग होता है और इन दोनों से परे किसी व्यक्तिया वस्तु की बात करनीहो तो “वह” शब्द इस्तेमाल करते हैं।तो “मैं”, “तुम” और “वह” को क्रमशः उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष, प्रथम पुरुष, कहते हैं।लेकिन स्मरण रहे किअंग्रेजी में I, You, और He के लिए First Second और Third person कहा गया है। कभी-कभी हिन्दी में भी उसी को दोहराते हुए कोई कह बैठता हैप्रथम पुरुष, द्वितीय पुरुष और तृतीय पुरुषऔर इस कारण गलती की संभावना बढ़ जाती है।तो हम जो व्याकरण की बात करेंगेउसमें उत्तम , माध्यम, और प्रथम पुरुष हिन्हीं शब्दों का
प्रयोग करेंगे।पुरुष के अलावा संज्ञा और सर्वनामों में एक वचन, द्विवचन और बहुवचन का भेद भी होता है। जिस कारण शब्द का रुप बदल जाता है।ये मजेदार बातें अगली कड़ी में करेंगे।
मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014
***व्याकरणकी मजेदार बातें 3 देवपुत्र फरवरी 2014
व्याकरणकी मजेदार बातें 3 देवपुत्र फरवरी 2014
February 2014
व्याकरण की मजेदार बातें (भाग ३)
-लीना मेहेंदले
आज हम भारतीय भाषाओं की एक खूबी की बात करते हैं कि कैसे एक नाम से दूसरे नाम बनते हैं।यह खूबी आई हैं संस्कृत भाषासे।जब दो व्यक्तियों के बीच माता-पिताऔर पुत्र-पुत्री का संबंध हो तब माता-पिता के नाम से पुत्र-पुत्री का नाम बनाया जा सकता है। आज हम ऐसे नाम बनाने के कुछ उदाहरण और नियम देखेंगे।
वैसे एक बात कह दूं कि कभी-कभी यह एक नाम से दूसरे नाम बनाने की क्रिया भौगोलिक संबंध भी दर्शाती है।
आरंभ करते हैंजनक दुलारी सीता से। जनक की पुत्री होने के कारण सीता का दूसरा नाम पड़ा जानकी। जनकराज का दूसरा नाम थाविदेह इससे शब्द बना वैदेही। इसी प्रकार जिस नगरी में सीता राज्यकन्या थीवह थी मिथीला नगरी। तो मिथीला नगरी के नाम पर सीता का नाम पड़ा मैथिली।इस प्रकार हमने देखा कि-
जनक से - जानकी
विदेह से- वैदेही
मिथिला से - मैथिली।
इसी प्रकार से द्रौपदी के नाम भी हम देख सकतें हैं। उसका असली नाम था
कृष्णा क्योंकि वह सांवली थी लेकिन उसके अन्य नाम थे- द्रुपद राजा की पुत्री अतः द्रोपदी ।पांचाल देश की राजकुमारी अतः पांचाली यज्ञ से उत्पन्न होने के कारण - याज्ञसेनी।इसी प्रकार रघुवंश में जन्म लेने के कारण राम का नाम पड़ा- राघव
यदुवंशमें जन्मेकृष्ण का नाम- यादव
पाण्डु राजा के पुत्रों का नाम- पाण्डव
कुरुवंश राजपुत्रों का संबोधन- कौरव
मनु के पुत्रों का संबोधन- मानव.
हमारे देश का नाम है भारत। इसका भी इतिहास है। यहाँ एक महापराक्रमी राजा हुए भरत उनके नाम पर हमारे देश का नाम पड़ा- भरत से भारत।वैसे अपने देश में दो प्रसिद्ध भरत और भी थे। एक प्रतापी राजा जड़भरत जो बाद में संन्यासी बनकर महान तत्ववेत्ता और दार्शनिक बने।दूसरे थे भक्तियोग के महानायक दशरथ पुत्र भरत जिन्होंने प्रतिनिधि के रुप में चौदह वर्षों तक आयोध्या की राजगद्दी संभाली।तो भारत नाम के पीछे चाहे जिस भरत का नाम हो - दार्शनिक भरत या भक्त शिरोमणि भरत या महापराक्रमी राजा भरत। हमें तो व्याकरण से मतलब हैकि भरत के नाम पर अपने देश का नाम हुआ हैभारत।
इस कडी में मुझे सबसे ज्यादा मजा आया जब मैंने भारतीय महीनों के नाम को नक्षत्रों के नाम के साथ जोड़कर देखा।सत्ताईस नक्षत्रों में से बारह नक्षत्रों के नाम से बारह महीने बने हैंजो इस प्रकार है-
चित्रा नक्षत्र से - चैत्र
विशाखा नक्षत्र से - वैशाख
ज्येष्ठा नक्षत्र से- ज्येष्ठ
आषाढ़ा नक्षत्र से- आषाढ़
श्रवण नक्षत्र से- श्रावण
भाद्रपदा नक्षत्र से- भाद्रपद
अश्विनी नक्षत्र से- अश्विन
कृत्तिका नक्षत्र से- कार्तिक
मृगशिरा नक्षत्र से- मार्गशीर्ष
पुष्य नक्षत्र से- पौष
मघा नक्षत्र से - माघ
फाल्गुनी नक्षत्र से- फाल्गुनमहिना।
इसी प्रकार और दो नामों की चर्चा करते हैं-
भगीरथ राजा के प्रयत्न से गंगा नदी को स्वर्ग से धरती पर लाया गया इसलिए गंगाको भगीरथ की पुत्री माना जाता है।तो भगीरथ पुत्री होने से गंगा का नाम पड़ाभागीरथी।इसी प्रकार दशरथ पुत्र होने से राम का दशरथि ।देखा कितनी समानता हैदो नामों में।इसी प्रकार-
कुंती पुत्रका नामकौन्तेय(अर्जुन)
राधा पुत्र का नाम राधेय (कर्ण)
गंगा पुत्र का नाम गांगेय (भीष्म)
अंजनी पुत्रका नाम आंजनेय (हनुमान)
कौसल्या पुत्रका नाम सौमित्र (लक्ष्मण)
सुभद्रा पुत्र का नाम सौभद्र (अभिमन्यु)
इन सारे मूल नामों में और उनसे उत्पन्न नामों को गौर से देखने पर तुम्हें उनके नियमों का कुछ तो अन्दाजा हो ही गया होगा। ये नाम सारे देश की सांस्कृतिक धरोहर हैं और सबकी समझ में आते हैं। लेकिन हाँ, उनका व्याकरण से क्या नाता हैतुमने अब जाना है। तो इसे याद रखना।
February 2014
व्याकरण की मजेदार बातें (भाग ३)
-लीना मेहेंदले
आज हम भारतीय भाषाओं की एक खूबी की बात करते हैं कि कैसे एक नाम से दूसरे नाम बनते हैं।यह खूबी आई हैं संस्कृत भाषासे।जब दो व्यक्तियों के बीच माता-पिताऔर पुत्र-पुत्री का संबंध हो तब माता-पिता के नाम से पुत्र-पुत्री का नाम बनाया जा सकता है। आज हम ऐसे नाम बनाने के कुछ उदाहरण और नियम देखेंगे।
वैसे एक बात कह दूं कि कभी-कभी यह एक नाम से दूसरे नाम बनाने की क्रिया भौगोलिक संबंध भी दर्शाती है।
आरंभ करते हैंजनक दुलारी सीता से। जनक की पुत्री होने के कारण सीता का दूसरा नाम पड़ा जानकी। जनकराज का दूसरा नाम थाविदेह इससे शब्द बना वैदेही। इसी प्रकार जिस नगरी में सीता राज्यकन्या थीवह थी मिथीला नगरी। तो मिथीला नगरी के नाम पर सीता का नाम पड़ा मैथिली।इस प्रकार हमने देखा कि-
जनक से - जानकी
विदेह से- वैदेही
मिथिला से - मैथिली।
इसी प्रकार से द्रौपदी के नाम भी हम देख सकतें हैं। उसका असली नाम था
कृष्णा क्योंकि वह सांवली थी लेकिन उसके अन्य नाम थे- द्रुपद राजा की पुत्री अतः द्रोपदी ।पांचाल देश की राजकुमारी अतः पांचाली यज्ञ से उत्पन्न होने के कारण - याज्ञसेनी।इसी प्रकार रघुवंश में जन्म लेने के कारण राम का नाम पड़ा- राघव
यदुवंशमें जन्मेकृष्ण का नाम- यादव
पाण्डु राजा के पुत्रों का नाम- पाण्डव
कुरुवंश राजपुत्रों का संबोधन- कौरव
मनु के पुत्रों का संबोधन- मानव.
हमारे देश का नाम है भारत। इसका भी इतिहास है। यहाँ एक महापराक्रमी राजा हुए भरत उनके नाम पर हमारे देश का नाम पड़ा- भरत से भारत।वैसे अपने देश में दो प्रसिद्ध भरत और भी थे। एक प्रतापी राजा जड़भरत जो बाद में संन्यासी बनकर महान तत्ववेत्ता और दार्शनिक बने।दूसरे थे भक्तियोग के महानायक दशरथ पुत्र भरत जिन्होंने प्रतिनिधि के रुप में चौदह वर्षों तक आयोध्या की राजगद्दी संभाली।तो भारत नाम के पीछे चाहे जिस भरत का नाम हो - दार्शनिक भरत या भक्त शिरोमणि भरत या महापराक्रमी राजा भरत। हमें तो व्याकरण से मतलब हैकि भरत के नाम पर अपने देश का नाम हुआ हैभारत।
इस कडी में मुझे सबसे ज्यादा मजा आया जब मैंने भारतीय महीनों के नाम को नक्षत्रों के नाम के साथ जोड़कर देखा।सत्ताईस नक्षत्रों में से बारह नक्षत्रों के नाम से बारह महीने बने हैंजो इस प्रकार है-
चित्रा नक्षत्र से - चैत्र
विशाखा नक्षत्र से - वैशाख
ज्येष्ठा नक्षत्र से- ज्येष्ठ
आषाढ़ा नक्षत्र से- आषाढ़
श्रवण नक्षत्र से- श्रावण
भाद्रपदा नक्षत्र से- भाद्रपद
अश्विनी नक्षत्र से- अश्विन
कृत्तिका नक्षत्र से- कार्तिक
मृगशिरा नक्षत्र से- मार्गशीर्ष
पुष्य नक्षत्र से- पौष
मघा नक्षत्र से - माघ
फाल्गुनी नक्षत्र से- फाल्गुनमहिना।
इसी प्रकार और दो नामों की चर्चा करते हैं-
भगीरथ राजा के प्रयत्न से गंगा नदी को स्वर्ग से धरती पर लाया गया इसलिए गंगाको भगीरथ की पुत्री माना जाता है।तो भगीरथ पुत्री होने से गंगा का नाम पड़ाभागीरथी।इसी प्रकार दशरथ पुत्र होने से राम का दशरथि ।देखा कितनी समानता हैदो नामों में।इसी प्रकार-
कुंती पुत्रका नामकौन्तेय(अर्जुन)
राधा पुत्र का नाम राधेय (कर्ण)
गंगा पुत्र का नाम गांगेय (भीष्म)
अंजनी पुत्रका नाम आंजनेय (हनुमान)
कौसल्या पुत्रका नाम सौमित्र (लक्ष्मण)
सुभद्रा पुत्र का नाम सौभद्र (अभिमन्यु)
इन सारे मूल नामों में और उनसे उत्पन्न नामों को गौर से देखने पर तुम्हें उनके नियमों का कुछ तो अन्दाजा हो ही गया होगा। ये नाम सारे देश की सांस्कृतिक धरोहर हैं और सबकी समझ में आते हैं। लेकिन हाँ, उनका व्याकरण से क्या नाता हैतुमने अब जाना है। तो इसे याद रखना।
गुरुवार, 19 दिसंबर 2013
***व्याकरणकी मजेदार बातें 2--भाषा है क्या क्या- देवपुत्र दिसम्बर 2013
व्याकरणकी मजेदार बातें 2--देवपुत्र दिसम्बर 2013
December २०१३
भाषा है क्या क्या?
भाषा क्या है? हम क्यों बोलते हैं? - सीधी सी बात है। हम अपने बात को दूसरे तक पहुँचाने के लिए बोलते हैं। जो हम बोलते हैं उसे भाषा कहते हैं।
लेकिन रुको। क्या तुमने कभी किसी पेड पर चढने का आनन्द लिया है? या फिर कभी खिडकी की सरिया पकडकर खिडकी की मुंडेर पर चढा हैं? कोई ऐसा काम किया है जो अँडव्हेंचर मे आता है?कोई भी ऐसा काम जो करने पर दोस्त-माता पिता-चाहने वाले सबकी आँखो मे प्रशंसा का भाव भर जाता हैं? ऐसा कोई अँडव्हेचर करनेपर मन नही मानता। मन उकसाता हैं- चलो अब एक अँडव्हेचर और करो।
तो एक बार मेरे साथ भी यही हुवा। मैं लिख बैठी कि भाषा जो है, सो अपनी बात को दूसरे तक पहुँचाने का माध्यम है। तो मनने टोक कर पूछा- बस इतना ही? फिर मुझे चिढाते हुए कहा - सोचो, सोचो, भाषा और भी बहुत कुछ है। फिर मैने सोचा तो लगा- सचमुच भाषा केवल संवाद का माध्यम नही हैं। भाषा सामर्थ्य है- सौंदर्य है और एक लयबध्द नियमबध्द व्यवस्था भी है। इन तीनोंके कारण शक्ती भी हैं। और संस्कृति का परिचय तो हमारी भाषा से ही होता है।
भाषा में सामर्थ्य है -- हमे प्रोत्साहित करने का, हमे दुखी करने का, हमे खुश करने का। जब हमारे ऋषि कहते हैं- उत्तिष्ठत जाग्रत, प्राय वरान्निबोधित -- अर्थात उठो जागो और उसे जानो जो सबसे अच्छा है और उसे पाने का प्रयास करो -- तो हमे प्रेरणा मिलती है। जब माँ पिता कहते है कि, तुमने हमारा सर ऊँचा कर दिया हैं, तब मन में एक आत्मविश्वास भर जाता हैं। कोई डाँट दे कि क्या गलती कर रहे हो, तो वाकई हम सोचने लगते हैं कि क्या और क्यों गलती कर डाली। इस प्रकार भाषा में सामर्थ्य हैं- भाव उत्पन्न करने का।
भाषा में सौदर्य भी है। जैसे जब हम पहली बार सुनते हैं- "चाचाने चाचीको चान्दीके चम्मच से चटनी चटाई" तो मन अनायास इस भाषा लालित्य पर मुग्ध हो जाता है। या यह पंक्ति हो- "तरनी तनुजा तट तमाल तरुवर बहू छाये"। या फिर यह पंक्तियाँ देखो-
पयसा कमलं कमलेन पयः
पयसा कमलेन विभाति सरः।
मणिना वलयं, वलयेन मणिः
मणिना वलयेन विभाति करः।।
इस प्रकार भाषा एक सौदर्य, लालित्य और माधुर्य का भाव भी जगाती है।
भाषा में जो एक नियमबद्धता और व्यवस्था होती है उसका भी अपना महत्व है। यह नियमबद्धता दो तरह से प्रकट होती है। पद्य रचना हो तो उसे छंद, ताल, लय का ध्यान रखना पडता हैं। गद्य रचना हो तो हर वाक्य की रचना का ध्यान रखना पडता हैं। इसीको व्याकरण कहते हैं।
भाषा से संस्कृती भी झलकती है। गंगा मैया कहने से झलकता है कि हमारी संस्कृती मे नदी को माँ जैसा सम्मान दिया जाता है। जब हम कहते हैं अतिथि देवो भव तो इससे हमारी अतिथिको सम्मान देने की परंपरा झलकती है। जब हम सुनते है - "रखिया बंधा ले भैया सावन आइल" तो हमारी भारतीय संस्कृती मे भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को बात समझ में आती है।
और भाषा सें ज्ञान का प्रवाह होता है इस बातको कौन नही जानता? मनुष्य ने भाषा बोलना सीखा इसी लिये अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य कहीं से कहीं पहुँच गया। हम भी अपनी भाषा का सम्मान करें क्योंकि, उसी को आधार बनाकर हम ऊँचाईयोंको छू सकते हैं।
---------------------x----------------------
December २०१३
भाषा है क्या क्या?
भाषा क्या है? हम क्यों बोलते हैं? - सीधी सी बात है। हम अपने बात को दूसरे तक पहुँचाने के लिए बोलते हैं। जो हम बोलते हैं उसे भाषा कहते हैं।
लेकिन रुको। क्या तुमने कभी किसी पेड पर चढने का आनन्द लिया है? या फिर कभी खिडकी की सरिया पकडकर खिडकी की मुंडेर पर चढा हैं? कोई ऐसा काम किया है जो अँडव्हेंचर मे आता है?कोई भी ऐसा काम जो करने पर दोस्त-माता पिता-चाहने वाले सबकी आँखो मे प्रशंसा का भाव भर जाता हैं? ऐसा कोई अँडव्हेचर करनेपर मन नही मानता। मन उकसाता हैं- चलो अब एक अँडव्हेचर और करो।
तो एक बार मेरे साथ भी यही हुवा। मैं लिख बैठी कि भाषा जो है, सो अपनी बात को दूसरे तक पहुँचाने का माध्यम है। तो मनने टोक कर पूछा- बस इतना ही? फिर मुझे चिढाते हुए कहा - सोचो, सोचो, भाषा और भी बहुत कुछ है। फिर मैने सोचा तो लगा- सचमुच भाषा केवल संवाद का माध्यम नही हैं। भाषा सामर्थ्य है- सौंदर्य है और एक लयबध्द नियमबध्द व्यवस्था भी है। इन तीनोंके कारण शक्ती भी हैं। और संस्कृति का परिचय तो हमारी भाषा से ही होता है।
भाषा में सामर्थ्य है -- हमे प्रोत्साहित करने का, हमे दुखी करने का, हमे खुश करने का। जब हमारे ऋषि कहते हैं- उत्तिष्ठत जाग्रत, प्राय वरान्निबोधित -- अर्थात उठो जागो और उसे जानो जो सबसे अच्छा है और उसे पाने का प्रयास करो -- तो हमे प्रेरणा मिलती है। जब माँ पिता कहते है कि, तुमने हमारा सर ऊँचा कर दिया हैं, तब मन में एक आत्मविश्वास भर जाता हैं। कोई डाँट दे कि क्या गलती कर रहे हो, तो वाकई हम सोचने लगते हैं कि क्या और क्यों गलती कर डाली। इस प्रकार भाषा में सामर्थ्य हैं- भाव उत्पन्न करने का।
भाषा में सौदर्य भी है। जैसे जब हम पहली बार सुनते हैं- "चाचाने चाचीको चान्दीके चम्मच से चटनी चटाई" तो मन अनायास इस भाषा लालित्य पर मुग्ध हो जाता है। या यह पंक्ति हो- "तरनी तनुजा तट तमाल तरुवर बहू छाये"। या फिर यह पंक्तियाँ देखो-
पयसा कमलं कमलेन पयः
पयसा कमलेन विभाति सरः।
मणिना वलयं, वलयेन मणिः
मणिना वलयेन विभाति करः।।
इस प्रकार भाषा एक सौदर्य, लालित्य और माधुर्य का भाव भी जगाती है।
भाषा में जो एक नियमबद्धता और व्यवस्था होती है उसका भी अपना महत्व है। यह नियमबद्धता दो तरह से प्रकट होती है। पद्य रचना हो तो उसे छंद, ताल, लय का ध्यान रखना पडता हैं। गद्य रचना हो तो हर वाक्य की रचना का ध्यान रखना पडता हैं। इसीको व्याकरण कहते हैं।
भाषा से संस्कृती भी झलकती है। गंगा मैया कहने से झलकता है कि हमारी संस्कृती मे नदी को माँ जैसा सम्मान दिया जाता है। जब हम कहते हैं अतिथि देवो भव तो इससे हमारी अतिथिको सम्मान देने की परंपरा झलकती है। जब हम सुनते है - "रखिया बंधा ले भैया सावन आइल" तो हमारी भारतीय संस्कृती मे भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को बात समझ में आती है।
और भाषा सें ज्ञान का प्रवाह होता है इस बातको कौन नही जानता? मनुष्य ने भाषा बोलना सीखा इसी लिये अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य कहीं से कहीं पहुँच गया। हम भी अपनी भाषा का सम्मान करें क्योंकि, उसी को आधार बनाकर हम ऊँचाईयोंको छू सकते हैं।
---------------------x----------------------
***व्याकरणकी मजेदार बातें 1--वर्णमाला देवपुत्र नवम्बर 2013
व्याकरणकी मजेदार बातें 1--देवपुत्र नवम्बर 2013
लीना मेहेंदले
हमारी भारतीय संस्कृति की मान्यता है कि अनादिकाल में ब्रह्म और शक्ति एक रूप थे- मानो ऊर्जा का एक विस्तीर्ण सागर हो और इस ब्रह्म की शक्ति ने प्रकट होना चाहा तो सबसे पहले उत्पन्न हुआ - नादब्रह्म अर्थात ॐ नाद। फिर नादब्रह्म से उत्पन्न हुआ शब्द। इसी के साथ-साथ वाणीयुक्त प्राणीमात्र उत्पन्न हुए, तो उन सबके बीच आपसी संवाद का माध्यम बना शब्दब्रह्म। अर्थात् जिस तरह ब्रह्म निर्गुण और निराकार है, उस तरह शब्दब्रह्म निर्गुण निराकार नही है। उसके पास आकार है, इसलिये उसके पास नियम भी हैं।
जैसे, हम जो भी मनुष्य हैं उनके आकार का नियम है- कि उनके दो हाथ, दो पाँव, एक मस्तक, एक पेट, एक धड इत्यादि होंगे। उसी प्रकार शब्दोंका आकार जानने के लिये नियम समझ लो- बस, वे सरल हो जाएंगे। तो शब्दोंको समझने के लिये हम उनके अक्षरोंको पहचानते हैं। जब कोयल गाती है तो एक शब्द प्रकट होता है- कूssहू! हम उसके दो अक्षरों को अलग-अलग पहचान सकते हैं- कू और हू। और इनके अन्तर को भी पहचान सकते हैं। जब गाय रंभाती है - हss म्मा ss तब हम ह और म को पहचान सकते है। म के साथ आ लगा है और वह कोयल की कूहू के अक्षर से अलग है, यह भी एक पहचान लेते है।
हमारी संस्कृति में हम यह भी पढ़ते हैं कि ब्रह्म से जब शक्ति प्रकट हुई तब उसका पहला आश्वासक और वरदायी रूप था वाणी - अर्थात् सरस्वती का। सरस्वती ने शब्दब्रह्म के साथ अक्षरों को ब्रह्मस्वरूप कर दिया उनमे मंत्र की शक्ति भर दी। और इसी कारण उनका एक क्रम भी बना दिया। इसी लिये कहा जाता है- “अमंत्रं अक्षरम् नास्ति ” अर्थात् मंत्र शक्ति न हो ऐसा कोई भी अक्षर नही हैं- हर अक्षर में मंत्र शक्ति है- यदि हमे उसे जागृत करने की विधी आ जाए तो हम उससे लाभ उठाते हैं।
लीना मेहेंदले
बच्चों,
मैं
यदि कहूँ कि व्याकरण की मजेदार
बातें जानने की और व्याकरण सीखने की शुरुआत हम ॐ
कार
से करते हैं तो तुम चौककर कहोगे- अच्छा इस व्याकरण ने ॐ
तक को घेर लिया है। तो पहले
देखे की ॐ
और व्याकरण का क्या नाता हैं?
हमारी भारतीय संस्कृति की मान्यता है कि अनादिकाल में ब्रह्म और शक्ति एक रूप थे- मानो ऊर्जा का एक विस्तीर्ण सागर हो और इस ब्रह्म की शक्ति ने प्रकट होना चाहा तो सबसे पहले उत्पन्न हुआ - नादब्रह्म अर्थात ॐ नाद। फिर नादब्रह्म से उत्पन्न हुआ शब्द। इसी के साथ-साथ वाणीयुक्त प्राणीमात्र उत्पन्न हुए, तो उन सबके बीच आपसी संवाद का माध्यम बना शब्दब्रह्म। अर्थात् जिस तरह ब्रह्म निर्गुण और निराकार है, उस तरह शब्दब्रह्म निर्गुण निराकार नही है। उसके पास आकार है, इसलिये उसके पास नियम भी हैं।
जैसे, हम जो भी मनुष्य हैं उनके आकार का नियम है- कि उनके दो हाथ, दो पाँव, एक मस्तक, एक पेट, एक धड इत्यादि होंगे। उसी प्रकार शब्दोंका आकार जानने के लिये नियम समझ लो- बस, वे सरल हो जाएंगे। तो शब्दोंको समझने के लिये हम उनके अक्षरोंको पहचानते हैं। जब कोयल गाती है तो एक शब्द प्रकट होता है- कूssहू! हम उसके दो अक्षरों को अलग-अलग पहचान सकते हैं- कू और हू। और इनके अन्तर को भी पहचान सकते हैं। जब गाय रंभाती है - हss म्मा ss तब हम ह और म को पहचान सकते है। म के साथ आ लगा है और वह कोयल की कूहू के अक्षर से अलग है, यह भी एक पहचान लेते है।
हमारी संस्कृति में हम यह भी पढ़ते हैं कि ब्रह्म से जब शक्ति प्रकट हुई तब उसका पहला आश्वासक और वरदायी रूप था वाणी - अर्थात् सरस्वती का। सरस्वती ने शब्दब्रह्म के साथ अक्षरों को ब्रह्मस्वरूप कर दिया उनमे मंत्र की शक्ति भर दी। और इसी कारण उनका एक क्रम भी बना दिया। इसी लिये कहा जाता है- “अमंत्रं अक्षरम् नास्ति ” अर्थात् मंत्र शक्ति न हो ऐसा कोई भी अक्षर नही हैं- हर अक्षर में मंत्र शक्ति है- यदि हमे उसे जागृत करने की विधी आ जाए तो हम उससे लाभ उठाते हैं।
इस
प्रकार अक्षरों का क्रम बना
-
क,
ख,
ग,
घ,
ड,
- क्यों
कि इन
पांचो का उच्चार करने के लिये
एक ही प्रकार की शारीरिक हलचल
होती है-
कण्ठ
से और इनके उच्चारण में जीभ
कही टिकती
नहीं। इन्हें
कण्ठवर्ग कहा जाता है।
अगले पांच अक्षर देखो-
च
,
छ,
ज,
झ
,
ञ।
ये
भी एक ही प्रकार से उच्चारित
होते है जीभ को
तालू में टिकाकर -
इसलिये
उन्हें तालव्य कहते हैं।
तो कुछ ऐसी बनी है हमारी भाषा, हमारे शब्द, हमारे अक्षर। अगली कडी में इनको विस्तार से समझेंगे।
तो कुछ ऐसी बनी है हमारी भाषा, हमारे शब्द, हमारे अक्षर। अगली कडी में इनको विस्तार से समझेंगे।
---------------------------------------------------------------------
बुधवार, 16 अक्टूबर 2013
सदस्यता लें
संदेश (Atom)