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रविवार, 11 मई 2014

व्याकरणकी मजेदार बातें 7 देवपुत्र June 2014

vyakaran 7 चा छ
बच्चों , पि ले अंकमे हमने देखा कि भारतीय भाषाओंमें दो शब्दोंको जोडनेकी दो विधियाँ हैंसंधी और समास ।
 आज हम समासके संबंधमे कुछ  बातें जानेंगे। समास में जिन दो शब्दों को मिलाया जाता है, उनके साथ कु और भी शब्द जुडे हुए होते है जो उनके सामासिक शब्दके भाव को बखान करते है, परंन्तु प्रत्यक्ष समास में उनका लोप हो जाता है ।
मित्रौं, मेरे स्कूलके दिनोंमें जब हमें समासवाला पाठ पढा रहेथे तो में चकित हो रही थी कि कितनी
सूक्ष्मता से छोटी  छोटी बातों के लेकर अलग अलग नियम बने, और यद्यपि यह छोटा शब्द है समास, किन्तु यह पाठ वाकई मे बडी विस्तार से है। लेकिन जब पाठके अंतमे बहुब्रीहि समाज की बात आई, तब तो मैं अभिभूत हो गई।  
जैसे अचानक कोई सुंदर  चित्र सामने आ जाये, वैही ही खुशी होती है जब कोई सुंदर कल्पना सामने आ जाय । ऐसे ही होते है बहुब्रीहि समास के शब्द।

समासमें  चूँकी कमसे दो शब्दो को या दो पदों को जोडा जाता है , इसलिये समास की  चार श्रेणियाँ की गई है।
यदि पूर्वपद प्रधान हो तो वह अव्ययीभाव समास होता है जैसे अनुरूप । उत्तरपद प्रधान हो तो तत्पुरुष। दोनों पद समनभावसे हों तो  द्वन्द्व। लेकिन कभी कभी ऐसा भी होता है कि दोनों पदो के बाहर कोई तीसरी बात ही इंगित होती है। ऐसे समासों को बहुब्रीहि कहते है। एक शब्द देखो पीताम्बर -- इसका सरल अर्थ है पीला वस्त्र। परंन्तु हम इसका विशेष अर्थ लगाते हैं और जो बहुधा पीला वस्त्र धारण करता है ऐसे श्रीकृष्ण को पीताम्बर कहते है । इसी प्रकार शनैश्चर का सरल अर्थ होगा धीरे चलना । लेकिन विशेष रूपसे हमने यह नाम उस ग्रह को दे दिया जो आकाशमें बहुत धीरे धीरे . चलता हुआ प्रतीत होता है अर्थात शनि ग्रह ।
इस प्रकार बहुब्रीहि समास न केवल भाषा के चमत्कार ओर अलंकार को बढाता है, वरन भाषा में एक
गूढता भी निर्माण करता है जो हमारे संचित ज्ञानके आधार पर टिकी है।
एक शब्द देखो गरुडध्वज इसके दो पद हैं गरुड और ध्वज । लेकीन इसका विग्रह करते हैं गरुड . चिह्न का
हैं जिसका ध्वज वह । यस्य ध्वजायाम् गरुडचिह्नः अस्ति सः अर्थात विष्णुः।
इसी प्रकार यस्य ध्वजायाम् कपि तिष्ठति सः कपिध्वजः अर्थात अर्जुन।
लेकिन कपिध्वज का अर्थ अर्जुन है यह जानने के लिय हमें उस कहानीसे परिचित होना होगा कि कैसे हनुमानजी ने अर्जुन के रथ पर उसकी ध्वजा के रुप में बैठने का अभिवचन दिया।
बहुब्रीहि समास के विषयमें पहले हम यह समझें कि सही शब्द तो है बहुव्रीहि -- बहु व्रीहिः अस्ति यस्य सः -- अर्थात् जिसके पास बहुत अन्न हो -  जो संपन्न व्यक्ति हो। तो यहाँ हमने दोनों पदोंका सरल अर्थ बहुत अन्न नही लगाया वरन् दोनों अर्थोंसे परे एक ऐसी व्यक्तिको इंगित किया जो संपन्न है। इस प्रकार बहुव्रीहि समासका अच्छा उदाहरण तो स्वयं यह शब्द ही है। संस्कृतके नियमानुसार कभी कभी व अक्षर के पर्याय या अपभ्रंशके रूपमें ब अक्षर स्वीकृत हो जाता है। अतः यह शब्द बना बहुब्रीहि ।
अपनी पढाई के दिनोंमें भाषा लालित्य के विचारसे मैंने बहुब्रीहि समासके दो भेद किये थे -- वैसे शब्द जिनका प्रचलित अर्थ केवल एक खास व्यक्तिको इंगित करता है और दूसरी ओर बहुब्रीहि के ही वे शब्द जो एक पूरी श्रेणीको बताते हैं । पहले प्रकारके शब्दोंके पीछे कोई न कोई कहानी होती है। उदाहरणस्वरूप  लम्बोदर का सरल अर्थ हुआ बडा पेट और इसका  बहुब्रीहि शब्दार्थ होगा -- ऐसा  व्यक्ति (कोई भी) जिसका बडा पेट है परन्तु    प्रत्यक्षतः हम लम्बोदर शब्दको गणेशजीके नामके अर्थमें लेते हैं। इस श्रेणीके शब्दोंको समझनेके लिये हमें अपनी विरासतमें मिली सारी पौराणिक कथाओंको पढना या सुनना होगा - और जब तक पढाईकी अपेक्षा कहानीकी बात हो, तब तक तो उसका स्वागत ही है।
तो आओ, ऐसे शब्दोंकी सूचि बनाते हैं - और निश्चय करते हैं कि उनसे  संबंधित सारी कहानियाँ पढ डालेंगे --
 गजानन - गज (हाथी) के जैसे मुखवाला - जो गणेशजीका नाम है।
 पंचानन – पाँच मुखोंवाला -- जो शिवजीका नाम है।
 षडानन – शिवजीके बडे पुत्र कार्तिकेयका नाम ।
अब शिवजी के नाम देखो -
 चंद्रमौलि  या चंद्रशेखर - जिसके मस्तकपर चंद्रमा विराजमान है
 शशिधर - जिसने (शशी = चंद्रमा) को धारण किया है
 गंगाधर - जिसने गंगाको धारण किया है
 फणीधर -जिसने सर्पको धारण किया है ।
वाहनके आधारपर वृषभवाहन हुए शिव, मूषकवाहन हैं गणेश, मयूरवाहन है  कार्तिकेय, हंसवाहिनी है सरस्वती और सिंहवाहिनी है दुर्गा।
परन्तु मुरलीधर और गिरिधर दोनों श्रीकृष्णके नाम हैं। पद्मनाभलंबोदरशैलजागिरिजाहिमकिरीटिनी
लेकिन वारिवाह शब्द को देखो - जो पानीको ढोकर ले जाये वह अर्थात् बादल – तो यह भी बहुब्रीहि शब्द है लेकिन यह किसी भी बादलपर लागू है तो मैंने इसे दूसरी श्रेणीमें रखा हे। एक बडा मजेदार शब्द है द्विरेफ । इसका सरल अर्थ तो होगा दो बार र । लेकिन किसी कविमन रखनेवालेने इसे विशेष अर्थमें प्रयोगमें लाकर एक नया बहुब्रीहि शब्द दिया । वह कीटक जिसके नाम में र अक्षर दो बार आया है, अर्थात भ्रमर। तो जिस कविने पहली बार भँवरेके लिये द्विरेफ शब्दका उपयोग किया उसकी प्रतिभा को  हमें नमन करना पडेगा।

सामासिक शब्दोंके बारे में हम और भी पढते रहेंगे।
समासोंमें अनेकानेक सूक्ष्म भेद हैं। इनके विषयमें एक विस्तृत पाठ यू-ट्यूबपर उपलब्ध है जिसे श्री शाम चंदन मिश्रने बनाया है। संस्कृत जगत नामक ज्ञानस्थलपरभी पाठ देखनेको मिलते हैं।
भेद --
व्याधिकरण अर्थात् जब एक पद प्रथमामें और दूसरा षष्ठी या सप्तमी में हो।
समानाधिकरण – जब दोनों पदोंमें द्वितीया से सप्तमी इ. समानभावसे हों।






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शुक्रवार, 2 मई 2014

महाभारतकालीन भारतवर्षाचा नकाशा

महाभारतकालीन भारतवर्षाचा नकाशा

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

***व्याकरणकी मजेदार बातें 5 -- देवपुत्र एप्रिल 2014

व्याकरणकी मजेदार बातें 5 -- देवपुत्र एप्रिल 2014

April 2014
व्याकरण की मजेदार बातें (भाग ५)
-लीना मेहेंदले

     मित्रो! आज हम संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों की बात करेंगे।कहते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति जब विचार करने बैठते हैंतो उन्हें विश्व के रहस्य समझ मेंआने लगते हैं।हमारे चारो वेद ऋग्, युज, साम और अथर्व भी इसी प्रकार तपस्वी ऋषियोंके सम्मुख प्रकट हुए। फिर उन्हें लोगोंके बीच सुनाया गया। एक से दूसरे ने सुना, दूसरे से तिसरे ने और इस प्रकार उनका ज्ञान और प्रकाश फैलने लगा।
     लेकिन कुछ लोगों का केवल ज्ञान के प्रसार से संतोष नहीं होता।वे एक व्यवस्था बनाना चाहते हैं ताकि ज्ञान का प्रसार सुचारु रुप से चलता रहे। वे व्यवस्था के लिए नियम बनाने में जुट जाते हैं। नियमों का पालन कई तरह से सुविधाएं निर्माण करता है, अनुशासन सिखाता है, कुशलता प्रदान करता है। दूसरी ओर वह कल्पना - अविष्कार और नवनिर्माण में बाधक भी होता हैऔर यदि नियमों की सम्यक उपयोगिता को बारम्बर परख कर उनमें आवश्यक परिवर्तन न किए जाएं तो वही नियम बोझ बन जाते हैं।नियम बनाना अपने आप में एक जटिल परन्तु श्रेयस्कर काम होता है जो केवल
ज्ञानी एवं अनुभवी व्यक्ति ही कर सकते हैं। कुल मिलाकर यदि ज्ञान का अपना महत्व और उसके प्रसारण के लिए बने नियमों का महत्व, इनमें बीस उन्नीस इतना ही अन्तर होता है। दोनों ही महत्वपूर्ण होते हैं।
     जब वेद प्रकट हुए और उनके अन्दर समाहित ज्ञान का प्रसर भी होने लगा तो छः तरह की विधाओं में नियम बनाए गए जिन्हे वेदांग कहा जाता है।ये हैं- शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द और ज्योतिष।
     शिक्षा नामक वेदांग हमें वेदों के सूक्तों की सही उच्चारण विधी को समझाता है। ऐसी मान्यता है कि वेद सूक्तों के सही उच्चारण में मंत्र शक्ति होती है जिससे कई प्रकार के कार्य सपन्न होते हैं- साथ ही वे सूक्तियां हमें जीवन के अलग-अलग व्यवहारों में पारंगत करती हैं। कल्प नामकवेदांग हमें बताता है कि किसी कार्य को सपन्न करने की प्रक्रिया क्या होती है। एक-एक कर कौनसी क्रियाओं को किस प्रकार सम्पन्न करना है इत्यादि। अर्थात् आज के युग में ISO Certification का प्रोटोकाल या प्रोसिजर बनाया जाता है वही बात, किन्तु एक विशाल स्तर पर, कल्पों में वर्णित है। व्याकरण हमें वाक्य रचना के विषय में बताता है। निरुक्त से हमें शब्दोंकी उत्पत्ति
का ज्ञान होता है। ज्योतिष नामक वेदांग से हमें नक्षत्र, ग्रह, उनकी गतियाँ तथा खगोल शास्त्र का ज्ञान होता है और छन्द की तो बात ही मत पूछो - किसी भी पढ़ाई को गाकर पढ़ने से वह तुरंत याद हो जाती है, दीर्घकाल तक समृति में रहती है। और उसका अच्छा आकलन भी होता है।वेद सूक्त भी छ्न्दबद्ध्र हैं और हमारा प्रायः ७० प्रतिशत वाड्मय छन्दबद्ध है। तो यह छन्दों की पढ़ाई भी छः वेदांगो में से एक है। इस सारी नियमवाली के कारण ही वेद लिखित रूप में न होने पर भी उनका प्रसार हुआ, लोगों ने उन्हें समझा और उनके ज्ञान से लाभिन्वित हुए।


शनिवार, 5 अप्रैल 2014

***व्याकरणकी मजेदार बातें 6, मई 2014-- देवपुत्र

व्याकरणकी मजेदार बातें 6 -- देवपुत्र मई 2014
May 2014
व्याकरण की मजेदार बातें
शब्दोंको जोड़ने की अद्भुत विधियाँ(भाग५)
-लीना मेहेंदले

      बच्चो! आज हम संस्कृत और भारतीय भाषाओं का ऐसा चमत्कारी पक्ष देखेंगे जो संसार की दूसरी भाषाओं में नहीं हैं।दो या अधिक शब्दों को जोड़ने की दो अद्भुत विधियाँ हमारी भाषाओं में हैं जिन्हें हम सन्धि और समास के नाम से जानते हैं।
     पहले शब्द का अंतिम अक्षर और दूसरे शब्द का पहला अक्षर ये दोनों मिलाकर इन शब्दों की संधि की जा सकती है।एक ओर एक जोड़कर।संन्धिके सामान्य उदाहरण हमें अपनी दैनंदिन भाषा में बारबार मिल जाते हैं जैसे- ‘स्वागत’ अर्थात् ‘सु’ और ‘आगत’ की सन्धि। ‘महेश’ अर्थात् ‘महा’ और ‘ईश’ की सन्धि।सन्धि के लिए पहले शब्द का अन्तिम अक्षर और दूसरे शब्द के पहले अक्षर को कुछ खास खास नियमों के अनुसार जोड़ा जाता है।महा+ ऋषि से बना महर्षि, वन + औषधि= वनोषधि।
     परन्तु संस्कृत भाषा की विशेषता है कि ऐसी सामान्य सन्धि के अलावा विशेष सन्धि का भी चलन है जिसे समास कहेंगे जेसे शिवस्य और धनुष्यःजोड़कर बना शिवधनुष्यः। इसे हम हिन्दी में भी कह सकते है ‘शिव का धनुष’की जगह शिवधनुष।इसे समास कहते है। समास में जोड़े गए पदों को खोलकर विस्तार से उनका अर्थ बताने की प्रक्रियाको विग्रह कहते हैं।
     समास का एक लाभ हैकिसी बात को सारांश या छोटे शब्दों से व्यक्त करना और दूसरा लाभ है लालित्य अर्थात् भाषा कासौन्दर्य बढ़ाना।
     समास के लिए जब शब्दों को जोड़ा जाता है तब सन्धि की तरह उन्हें संयुक्त नहीं किया जाता बल्कि उनके भाव को जोड़ने जैसा कुछ किया जाता है।उदाहरण के लिए हम कुछ समास शब्द लेते हैं-
राजपुत्र अर्थात् राजा का पुत्र
रसोईघर अर्थात् रसोई के लिए बनाया घर (या कमरा)
आजीवन अर्थात् जीवन पर्यन्त 
जैसी मतिहै वैसा - यथामथि
राम एवं कृष्ण- रामकृष्ण
     इन शब्दों को बारिकी से देखने पर संधि और समास का अन्तर समझ में आता हैं।
     सन्धि और समास को आगे भी कुछ अकों में देखते और समझते रहेंगे।





गुरुवार, 27 मार्च 2014

क्रान्तिवीर बालक शिवा झा जन्म 1930 मृत्यू 1942

क्रान्तिवीर बालक शिवा झा जन्म 1930 मृत्यू 1942 







बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

***व्याकरणकी मजेदार बातें 4 देवपुत्र 2014

व्याकरणकी मजेदार बातें 4  देवपुत्र   2014


March 2014
व्याकरण की मजेदार बातें (भाग ४)
-लीना मेहेंदले

     मित्रो, हम अपनी इस व्याकरण की कड़ी में शब्दों के विषय में कुछ सीखेंगे।यह सदा स्मरण रहे कि मनुष्य ने पहले बोलना सीखा तत्पश्चात लिखनां सीखा। इसलिए हम भी पहलेशब्दों को पढ़ेगे, बाद में लिपी, वर्णमालाऔर अक्षरोंको।
     शब्दों का वर्गीकरण हम इस प्रकार करते हैं- संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रियापद (क्रिया), क्रियाविशेषण , अत्यय।इसमें से अत्ययों के तीन प्रकार बताए गए हैं- केवल प्रयोगी, उभयात्ययीऔर विस्मयादिबोधक।यह वर्गीकरण संस्कृत, हिन्दीसहित भारत की सभी भाषाओं पर लागू है और अंग्रेजी सहित सारी यूरोपीय भाषाओं पर भी।मेरे बच्चे जब शाला में पढ़ते थे तब मैंने उन्हें संज्ञा की परिभाषा ऐसे पढ़ाई थी- किसी व्यक्ति, जाति, वस्तु या भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं, जैसे राम, घोड़ा, पानी, भलाईइत्यादि।आज तक हम लोग कभी-कभी इस वाक्य को कोरस में गाकर ऐसा मजा लूटते हैं। खैर! और बोलचाल में बार-बार संज्ञा को दोहराने से वाक्य की सुन्दरता में बाधा आती है इसलिए हम सर्वनाम का उपयोग करते हैं।जैसे, राम पेड़ पर चढ़ा वहाँ से उसने दूर तक देखा।इस वाक्य से हम समझ जाते हैं कि “उसने” शब्द राम के लिए है जबकि “वहाँ” शब्द से ‘पेड़के ऊपर’ का बोध होता है।तो व्याकरण की आधी पढ़ाई तो शब्दोंके भेद और उनकेप्रयोग समझने से हो ही जाती है। सर्वनामों के साथ ‘पुरुष’ नामक एक संकल्पना जुड़ी है।बात करनेवाला जब अपने स्वयं के संबंधमेंकुछ कहना चाहता है तो वह अपने लिए “मैं” शब्द का प्रयोग करता है।संस्कृत में “अहं” शब्द का प्रयोग होता है।जैसे मैं जाती हूँ, मैंनेपुस्तक पढ़ी।बात सुनने वाले के संबंध में कुछ कहना हो तो ‘तुम’ या संस्कृतमें ‘त्वम्’ शब्द का प्रयोग होता है और इन दोनों से परे किसी व्यक्तिया वस्तु की बात करनीहो तो  “वह” शब्द इस्तेमाल करते हैं।तो “मैं”, “तुम” और “वह” को क्रमशः उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष, प्रथम पुरुष, कहते हैं।लेकिन स्मरण रहे किअंग्रेजी में I, You, और He के लिए First Second और Third person कहा गया है। कभी-कभी हिन्दी में भी उसी को दोहराते हुए कोई कह बैठता हैप्रथम पुरुष, द्वितीय पुरुष और तृतीय पुरुषऔर इस कारण गलती की संभावना बढ़ जाती है।तो हम जो व्याकरण की बात करेंगेउसमें उत्तम , माध्यम, और प्रथम पुरुष हिन्हीं शब्दों का 
प्रयोग करेंगे।पुरुष के अलावा संज्ञा और सर्वनामों में एक वचन, द्विवचन और बहुवचन का भेद भी होता है। जिस कारण शब्द का रुप बदल जाता है।ये मजेदार बातें अगली कड़ी में करेंगे।











































मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

***व्याकरणकी मजेदार बातें 3 देवपुत्र फरवरी 2014

व्याकरणकी मजेदार बातें 3  देवपुत्र फरवरी 2014

February 2014
व्याकरण की मजेदार बातें (भाग ३) 
-लीना मेहेंदले

      आज हम भारतीय भाषाओं की एक खूबी की बात करते हैं कि कैसे एक नाम से दूसरे नाम बनते हैं।यह खूबी आई हैं संस्कृत भाषासे।जब दो  व्यक्तियों के बीच माता-पिताऔर पुत्र-पुत्री का संबंध हो तब माता-पिता के नाम से पुत्र-पुत्री का नाम बनाया जा सकता है। आज हम ऐसे नाम बनाने के कुछ उदाहरण और नियम देखेंगे।
     वैसे एक बात कह दूं कि कभी-कभी यह एक नाम से दूसरे नाम बनाने की क्रिया भौगोलिक संबंध भी दर्शाती है।
     आरंभ करते हैंजनक दुलारी सीता से। जनक की पुत्री होने के कारण सीता का दूसरा नाम पड़ा जानकी। जनकराज का दूसरा नाम थाविदेह इससे शब्द बना वैदेही। इसी प्रकार जिस नगरी में सीता राज्यकन्या थीवह थी मिथीला नगरी। तो मिथीला नगरी के नाम पर सीता का नाम पड़ा मैथिली।इस प्रकार हमने देखा कि- 
जनक से - जानकी
विदेह से- वैदेही
मिथिला से - मैथिली।
      इसी प्रकार से द्रौपदी के नाम भी हम देख सकतें हैं। उसका असली नाम था 
कृष्णा क्योंकि वह सांवली थी लेकिन उसके अन्य नाम थे- द्रुपद राजा की पुत्री अतः द्रोपदी ।पांचाल देश की राजकुमारी अतः पांचाली यज्ञ से उत्पन्न होने के कारण - याज्ञसेनी।इसी प्रकार रघुवंश में जन्म लेने के कारण राम का नाम पड़ा- राघव
यदुवंशमें जन्मेकृष्ण का नाम- यादव
पाण्डु राजा के पुत्रों का नाम- पाण्डव
कुरुवंश राजपुत्रों का संबोधन- कौरव
मनु के पुत्रों का संबोधन- मानव.
     हमारे देश का नाम है भारत। इसका भी इतिहास है। यहाँ एक महापराक्रमी राजा हुए भरत उनके नाम पर हमारे देश का नाम पड़ा- भरत से भारत।वैसे अपने देश में दो प्रसिद्ध भरत और भी थे। एक प्रतापी राजा जड़भरत जो बाद में संन्यासी बनकर महान तत्ववेत्ता और दार्शनिक बने।दूसरे थे भक्तियोग के महानायक दशरथ पुत्र भरत जिन्होंने प्रतिनिधि के रुप में चौदह वर्षों तक आयोध्या की राजगद्दी संभाली।तो भारत नाम के पीछे चाहे जिस भरत का नाम हो - दार्शनिक भरत या भक्त शिरोमणि भरत या महापराक्रमी राजा भरत। हमें तो व्याकरण से मतलब हैकि भरत के नाम पर अपने देश का नाम हुआ हैभारत।
     इस कडी में मुझे सबसे ज्यादा मजा आया जब मैंने भारतीय महीनों के नाम को नक्षत्रों के नाम के साथ जोड़कर देखा।सत्ताईस नक्षत्रों में से बारह नक्षत्रों के नाम से बारह महीने बने हैंजो इस प्रकार है-
चित्रा नक्षत्र से - चैत्र
विशाखा नक्षत्र से - वैशाख
ज्येष्ठा नक्षत्र से- ज्येष्ठ
आषाढ़ा नक्षत्र से- आषाढ़
श्रवण नक्षत्र से- श्रावण
भाद्रपदा नक्षत्र से- भाद्रपद
अश्विनी नक्षत्र से- अश्विन
कृत्तिका नक्षत्र से- कार्तिक
मृगशिरा नक्षत्र से- मार्गशीर्ष
पुष्य नक्षत्र से- पौष
मघा नक्षत्र से - माघ
फाल्गुनी नक्षत्र से- फाल्गुनमहिना।
     इसी प्रकार और दो नामों की चर्चा करते हैं-
     भगीरथ राजा के प्रयत्न से गंगा नदी को स्वर्ग से धरती पर लाया गया इसलिए गंगाको भगीरथ की पुत्री माना जाता है।तो भगीरथ पुत्री होने से गंगा का नाम पड़ाभागीरथी।इसी प्रकार दशरथ पुत्र होने से राम का दशरथि ।देखा कितनी समानता हैदो नामों में।इसी प्रकार-
कुंती पुत्रका नामकौन्तेय(अर्जुन)
राधा पुत्र का नाम राधेय (कर्ण)
गंगा पुत्र का नाम गांगेय (भीष्म)
अंजनी पुत्रका नाम आंजनेय (हनुमान)
कौसल्या पुत्रका नाम सौमित्र (लक्ष्मण)
सुभद्रा पुत्र का नाम सौभद्र (अभिमन्यु)
     इन सारे मूल नामों में और उनसे उत्पन्न नामों को गौर से देखने पर तुम्हें उनके नियमों का कुछ तो अन्दाजा हो ही गया होगा। ये नाम सारे देश की सांस्कृतिक धरोहर हैं और सबकी समझ में आते हैं। लेकिन हाँ, उनका व्याकरण से क्या नाता हैतुमने अब जाना है। तो इसे याद रखना।