शनिवार, 23 अगस्त 2014
शनिवार, 9 अगस्त 2014
व्याकरणकी मजेदार बातें -8 चित्रप्रत बहुब्रीही -रोचक व बोधक देवपुत्र इंदौर जुलै 2014
देवपुत्र इंदौर के जुलै 2014 अंक में मेरा श्रृंखला- लेख, चित्रप्रत बहुब्रीही -रोचक व बोधक
व्याकरणकी मजेदार बातें -8
व्याकरणकी मजेदार बातें -8
रविवार, 11 मई 2014
व्याकरणकी मजेदार बातें 7 देवपुत्र June 2014
vyakaran 7 चा छ
अपनी पढाई के दिनोंमें भाषा लालित्य के विचारसे मैंने बहुब्रीहि समासके दो भेद किये थे -- वैसे शब्द जिनका प्रचलित अर्थ केवल एक खास व्यक्तिको इंगित करता है और दूसरी ओर बहुब्रीहि के ही वे शब्द जो एक पूरी श्रेणीको बताते हैं । पहले प्रकारके शब्दोंके पीछे कोई न कोई कहानी होती है। उदाहरणस्वरूप लम्बोदर का सरल अर्थ हुआ बडा पेट और इसका बहुब्रीहि शब्दार्थ होगा -- ऐसा व्यक्ति (कोई भी) जिसका बडा पेट है परन्तु प्रत्यक्षतः हम लम्बोदर शब्दको गणेशजीके नामके अर्थमें लेते हैं। इस श्रेणीके शब्दोंको समझनेके लिये हमें अपनी विरासतमें मिली सारी पौराणिक कथाओंको पढना या सुनना होगा - और जब तक पढाईकी अपेक्षा कहानीकी बात हो, तब तक तो उसका स्वागत ही है।
तो आओ, ऐसे शब्दोंकी सूचि बनाते हैं - और निश्चय करते हैं कि उनसे संबंधित सारी कहानियाँ पढ डालेंगे --
गजानन - गज (हाथी) के जैसे मुखवाला - जो गणेशजीका नाम है।
पंचानन – पाँच मुखोंवाला -- जो शिवजीका नाम है।
षडानन – शिवजीके बडे पुत्र कार्तिकेयका नाम ।
अब शिवजी के नाम देखो -
चंद्रमौलि या चंद्रशेखर - जिसके मस्तकपर चंद्रमा विराजमान है
शशिधर - जिसने (शशी = चंद्रमा) को धारण किया है
गंगाधर - जिसने गंगाको धारण किया है
फणीधर -जिसने सर्पको धारण किया है ।
वाहनके आधारपर वृषभवाहन हुए शिव, मूषकवाहन हैं गणेश, मयूरवाहन है कार्तिकेय, हंसवाहिनी है सरस्वती और सिंहवाहिनी है दुर्गा।
परन्तु मुरलीधर और गिरिधर दोनों श्रीकृष्णके नाम हैं। पद्मनाभ, लंबोदर, शैलजा, गिरिजा, हिमकिरीटिनी।
लेकिन वारिवाह शब्द को देखो - जो पानीको ढोकर ले जाये वह अर्थात् बादल – तो यह भी बहुब्रीहि शब्द है लेकिन यह किसी भी बादलपर लागू है तो मैंने इसे दूसरी श्रेणीमें रखा हे। एक बडा मजेदार शब्द है द्विरेफ । इसका सरल अर्थ तो होगा दो बार र । लेकिन किसी कविमन रखनेवालेने इसे विशेष अर्थमें प्रयोगमें लाकर एक नया बहुब्रीहि शब्द दिया । वह कीटक जिसके नाम में र अक्षर दो बार आया है, अर्थात भ्रमर। तो जिस कविने पहली बार भँवरेके लिये द्विरेफ शब्दका उपयोग किया उसकी प्रतिभा को हमें नमन करना पडेगा।
सामासिक शब्दोंके बारे में हम और भी पढते रहेंगे।
समासोंमें अनेकानेक सूक्ष्म भेद हैं। इनके विषयमें एक विस्तृत पाठ यू-ट्यूबपर उपलब्ध है जिसे श्री शाम चंदन मिश्रने बनाया है। संस्कृत जगत नामक ज्ञानस्थलपरभी पाठ देखनेको मिलते हैं।





बच्चों ,
पि ले
अंकमे हमने देखा कि भारतीय भाषाओंमें
दो शब्दोंको जोडनेकी दो विधियाँ
हैं- संधी और समास ।
आज हम समासके संबंधमे
कुछ बातें जानेंगे। समास
में जिन दो शब्दों को मिलाया
जाता है,
उनके साथ कुछ और भी शब्द जुडे
हुए होते है जो
उनके सामासिक शब्दके भाव को
बखान करते है,
परंन्तु प्रत्यक्ष
समास में उनका लोप हो जाता है
।
मित्रौं,
मेरे स्कूलके
दिनोंमें जब हमें समासवाला
पाठ पढा रहेथे तो में चकित
हो रही थी कि कितनी
सूक्ष्मता
से छोटी छोटी
बातों के लेकर अलग अलग नियम
बने,
और यद्यपि यह छोटा
शब्द है समास,
किन्तु यह पाठ वाकई
मे बडी विस्तार से है। लेकिन
जब पाठके अंतमे बहुब्रीहि
समाज की बात आई,
तब तो मैं अभिभूत
हो गई।
जैसे
अचानक
कोई सुंदर चित्र
सामने आ जाये,
वैही ही खुशी होती
है जब कोई सुंदर कल्पना सामने
आ जाय । ऐसे ही होते है बहुब्रीहि
समास के शब्द।
समासमें चूँकी
कमसे दो शब्दो को या दो पदों
को जोडा जाता है ,
इसलिये समास की चार
श्रेणियाँ की गई है।
यदि
पूर्वपद प्रधान हो तो वह
अव्ययीभाव समास होता है जैसे
अनुरूप । उत्तरपद प्रधान हो
तो तत्पुरुष। दोनों पद समनभावसे हों तो द्वन्द्व। लेकिन कभी कभी
ऐसा भी होता है कि दोनों पदो
के बाहर कोई तीसरी बात ही इंगित
होती है। ऐसे समासों को बहुब्रीहि
कहते है। एक शब्द देखो पीताम्बर -- इसका सरल अर्थ है पीला वस्त्र।
परंन्तु हम इसका विशेष अर्थ
लगाते हैं और जो बहुधा पीला
वस्त्र धारण करता है ऐसे श्रीकृष्ण को पीताम्बर कहते है ।
इसी प्रकार शनैश्चर का सरल अर्थ होगा
धीरे चलना
। लेकिन विशेष रूपसे हमने यह नाम
उस ग्रह को दे दिया जो आकाशमें
बहुत धीरे धीरे . चलता
हुआ प्रतीत होता है अर्थात
शनि ग्रह ।
इस
प्रकार बहुब्रीहि समास न केवल
भाषा के चमत्कार
ओर अलंकार को बढाता है,
वरन भाषा में एक
गूढता
भी निर्माण करता है जो हमारे
संचित
ज्ञानके आधार पर टिकी है।
एक
शब्द देखो गरुडध्वज इसके दो
पद हैं गरुड और ध्वज । लेकीन
इसका विग्रह करते हैं गरुड
. चिह्न
का
हैं
जिसका ध्वज वह । यस्य ध्वजायाम् गरुडचिह्नः अस्ति सः अर्थात विष्णुः।
इसी
प्रकार यस्य ध्वजायाम् कपि तिष्ठति सः कपिध्वजः अर्थात
अर्जुन।
लेकिन
कपिध्वज का अर्थ अर्जुन है यह जानने के लिय हमें उस कहानीसे परिचित
होना होगा कि कैसे हनुमानजी
ने अर्जुन के रथ पर उसकी ध्वजा
के रुप में बैठने का अभिवचन
दिया।
बहुब्रीहि समास के विषयमें पहले हम यह समझें कि सही शब्द तो है बहुव्रीहि -- बहु व्रीहिः अस्ति यस्य सः -- अर्थात् जिसके पास बहुत अन्न हो - जो संपन्न व्यक्ति हो। तो यहाँ हमने दोनों पदोंका सरल अर्थ बहुत अन्न नही लगाया वरन् दोनों अर्थोंसे परे एक ऐसी व्यक्तिको इंगित किया जो संपन्न है। इस प्रकार बहुव्रीहि समासका अच्छा उदाहरण तो स्वयं यह शब्द ही है। संस्कृतके नियमानुसार कभी कभी व अक्षर के पर्याय या अपभ्रंशके रूपमें ब अक्षर स्वीकृत हो जाता है। अतः यह शब्द बना बहुब्रीहि ।अपनी पढाई के दिनोंमें भाषा लालित्य के विचारसे मैंने बहुब्रीहि समासके दो भेद किये थे -- वैसे शब्द जिनका प्रचलित अर्थ केवल एक खास व्यक्तिको इंगित करता है और दूसरी ओर बहुब्रीहि के ही वे शब्द जो एक पूरी श्रेणीको बताते हैं । पहले प्रकारके शब्दोंके पीछे कोई न कोई कहानी होती है। उदाहरणस्वरूप लम्बोदर का सरल अर्थ हुआ बडा पेट और इसका बहुब्रीहि शब्दार्थ होगा -- ऐसा व्यक्ति (कोई भी) जिसका बडा पेट है परन्तु प्रत्यक्षतः हम लम्बोदर शब्दको गणेशजीके नामके अर्थमें लेते हैं। इस श्रेणीके शब्दोंको समझनेके लिये हमें अपनी विरासतमें मिली सारी पौराणिक कथाओंको पढना या सुनना होगा - और जब तक पढाईकी अपेक्षा कहानीकी बात हो, तब तक तो उसका स्वागत ही है।
तो आओ, ऐसे शब्दोंकी सूचि बनाते हैं - और निश्चय करते हैं कि उनसे संबंधित सारी कहानियाँ पढ डालेंगे --
गजानन - गज (हाथी) के जैसे मुखवाला - जो गणेशजीका नाम है।
पंचानन – पाँच मुखोंवाला -- जो शिवजीका नाम है।
षडानन – शिवजीके बडे पुत्र कार्तिकेयका नाम ।
अब शिवजी के नाम देखो -
चंद्रमौलि या चंद्रशेखर - जिसके मस्तकपर चंद्रमा विराजमान है
शशिधर - जिसने (शशी = चंद्रमा) को धारण किया है
गंगाधर - जिसने गंगाको धारण किया है
फणीधर -जिसने सर्पको धारण किया है ।
वाहनके आधारपर वृषभवाहन हुए शिव, मूषकवाहन हैं गणेश, मयूरवाहन है कार्तिकेय, हंसवाहिनी है सरस्वती और सिंहवाहिनी है दुर्गा।
परन्तु मुरलीधर और गिरिधर दोनों श्रीकृष्णके नाम हैं। पद्मनाभ, लंबोदर, शैलजा, गिरिजा, हिमकिरीटिनी।
लेकिन वारिवाह शब्द को देखो - जो पानीको ढोकर ले जाये वह अर्थात् बादल – तो यह भी बहुब्रीहि शब्द है लेकिन यह किसी भी बादलपर लागू है तो मैंने इसे दूसरी श्रेणीमें रखा हे। एक बडा मजेदार शब्द है द्विरेफ । इसका सरल अर्थ तो होगा दो बार र । लेकिन किसी कविमन रखनेवालेने इसे विशेष अर्थमें प्रयोगमें लाकर एक नया बहुब्रीहि शब्द दिया । वह कीटक जिसके नाम में र अक्षर दो बार आया है, अर्थात भ्रमर। तो जिस कविने पहली बार भँवरेके लिये द्विरेफ शब्दका उपयोग किया उसकी प्रतिभा को हमें नमन करना पडेगा।
सामासिक शब्दोंके बारे में हम और भी पढते रहेंगे।
समासोंमें अनेकानेक सूक्ष्म भेद हैं। इनके विषयमें एक विस्तृत पाठ यू-ट्यूबपर उपलब्ध है जिसे श्री शाम चंदन मिश्रने बनाया है। संस्कृत जगत नामक ज्ञानस्थलपरभी पाठ देखनेको मिलते हैं।
भेद --
व्याधिकरण
अर्थात् जब एक पद प्रथमामें
और दूसरा षष्ठी या सप्तमी में
हो।
समानाधिकरण
– जब
दोनों पदोंमें द्वितीया
से सप्तमी
इ. समानभावसे हों।
शुक्रवार, 2 मई 2014
गुरुवार, 10 अप्रैल 2014
***व्याकरणकी मजेदार बातें 5 -- देवपुत्र एप्रिल 2014
व्याकरणकी मजेदार बातें 5 -- देवपुत्र एप्रिल 2014
April 2014
व्याकरण की मजेदार बातें (भाग ५)
-लीना मेहेंदले
मित्रो! आज हम संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों की बात करेंगे।कहते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति जब विचार करने बैठते हैंतो उन्हें विश्व के रहस्य समझ मेंआने लगते हैं।हमारे चारो वेद ऋग्, युज, साम और अथर्व भी इसी प्रकार तपस्वी ऋषियोंके सम्मुख प्रकट हुए। फिर उन्हें लोगोंके बीच सुनाया गया। एक से दूसरे ने सुना, दूसरे से तिसरे ने और इस प्रकार उनका ज्ञान और प्रकाश फैलने लगा।
लेकिन कुछ लोगों का केवल ज्ञान के प्रसार से संतोष नहीं होता।वे एक व्यवस्था बनाना चाहते हैं ताकि ज्ञान का प्रसार सुचारु रुप से चलता रहे। वे व्यवस्था के लिए नियम बनाने में जुट जाते हैं। नियमों का पालन कई तरह से सुविधाएं निर्माण करता है, अनुशासन सिखाता है, कुशलता प्रदान करता है। दूसरी ओर वह कल्पना - अविष्कार और नवनिर्माण में बाधक भी होता हैऔर यदि नियमों की सम्यक उपयोगिता को बारम्बर परख कर उनमें आवश्यक परिवर्तन न किए जाएं तो वही नियम बोझ बन जाते हैं।नियम बनाना अपने आप में एक जटिल परन्तु श्रेयस्कर काम होता है जो केवल
ज्ञानी एवं अनुभवी व्यक्ति ही कर सकते हैं। कुल मिलाकर यदि ज्ञान का अपना महत्व और उसके प्रसारण के लिए बने नियमों का महत्व, इनमें बीस उन्नीस इतना ही अन्तर होता है। दोनों ही महत्वपूर्ण होते हैं।
जब वेद प्रकट हुए और उनके अन्दर समाहित ज्ञान का प्रसर भी होने लगा तो छः तरह की विधाओं में नियम बनाए गए जिन्हे वेदांग कहा जाता है।ये हैं- शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द और ज्योतिष।
शिक्षा नामक वेदांग हमें वेदों के सूक्तों की सही उच्चारण विधी को समझाता है। ऐसी मान्यता है कि वेद सूक्तों के सही उच्चारण में मंत्र शक्ति होती है जिससे कई प्रकार के कार्य सपन्न होते हैं- साथ ही वे सूक्तियां हमें जीवन के अलग-अलग व्यवहारों में पारंगत करती हैं। कल्प नामकवेदांग हमें बताता है कि किसी कार्य को सपन्न करने की प्रक्रिया क्या होती है। एक-एक कर कौनसी क्रियाओं को किस प्रकार सम्पन्न करना है इत्यादि। अर्थात् आज के युग में ISO Certification का प्रोटोकाल या प्रोसिजर बनाया जाता है वही बात, किन्तु एक विशाल स्तर पर, कल्पों में वर्णित है। व्याकरण हमें वाक्य रचना के विषय में बताता है। निरुक्त से हमें शब्दोंकी उत्पत्ति
का ज्ञान होता है। ज्योतिष नामक वेदांग से हमें नक्षत्र, ग्रह, उनकी गतियाँ तथा खगोल शास्त्र का ज्ञान होता है और छन्द की तो बात ही मत पूछो - किसी भी पढ़ाई को गाकर पढ़ने से वह तुरंत याद हो जाती है, दीर्घकाल तक समृति में रहती है। और उसका अच्छा आकलन भी होता है।वेद सूक्त भी छ्न्दबद्ध्र हैं और हमारा प्रायः ७० प्रतिशत वाड्मय छन्दबद्ध है। तो यह छन्दों की पढ़ाई भी छः वेदांगो में से एक है। इस सारी नियमवाली के कारण ही वेद लिखित रूप में न होने पर भी उनका प्रसार हुआ, लोगों ने उन्हें समझा और उनके ज्ञान से लाभिन्वित हुए।
April 2014
व्याकरण की मजेदार बातें (भाग ५)
-लीना मेहेंदले
मित्रो! आज हम संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों की बात करेंगे।कहते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति जब विचार करने बैठते हैंतो उन्हें विश्व के रहस्य समझ मेंआने लगते हैं।हमारे चारो वेद ऋग्, युज, साम और अथर्व भी इसी प्रकार तपस्वी ऋषियोंके सम्मुख प्रकट हुए। फिर उन्हें लोगोंके बीच सुनाया गया। एक से दूसरे ने सुना, दूसरे से तिसरे ने और इस प्रकार उनका ज्ञान और प्रकाश फैलने लगा।
लेकिन कुछ लोगों का केवल ज्ञान के प्रसार से संतोष नहीं होता।वे एक व्यवस्था बनाना चाहते हैं ताकि ज्ञान का प्रसार सुचारु रुप से चलता रहे। वे व्यवस्था के लिए नियम बनाने में जुट जाते हैं। नियमों का पालन कई तरह से सुविधाएं निर्माण करता है, अनुशासन सिखाता है, कुशलता प्रदान करता है। दूसरी ओर वह कल्पना - अविष्कार और नवनिर्माण में बाधक भी होता हैऔर यदि नियमों की सम्यक उपयोगिता को बारम्बर परख कर उनमें आवश्यक परिवर्तन न किए जाएं तो वही नियम बोझ बन जाते हैं।नियम बनाना अपने आप में एक जटिल परन्तु श्रेयस्कर काम होता है जो केवल
ज्ञानी एवं अनुभवी व्यक्ति ही कर सकते हैं। कुल मिलाकर यदि ज्ञान का अपना महत्व और उसके प्रसारण के लिए बने नियमों का महत्व, इनमें बीस उन्नीस इतना ही अन्तर होता है। दोनों ही महत्वपूर्ण होते हैं।
जब वेद प्रकट हुए और उनके अन्दर समाहित ज्ञान का प्रसर भी होने लगा तो छः तरह की विधाओं में नियम बनाए गए जिन्हे वेदांग कहा जाता है।ये हैं- शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द और ज्योतिष।
शिक्षा नामक वेदांग हमें वेदों के सूक्तों की सही उच्चारण विधी को समझाता है। ऐसी मान्यता है कि वेद सूक्तों के सही उच्चारण में मंत्र शक्ति होती है जिससे कई प्रकार के कार्य सपन्न होते हैं- साथ ही वे सूक्तियां हमें जीवन के अलग-अलग व्यवहारों में पारंगत करती हैं। कल्प नामकवेदांग हमें बताता है कि किसी कार्य को सपन्न करने की प्रक्रिया क्या होती है। एक-एक कर कौनसी क्रियाओं को किस प्रकार सम्पन्न करना है इत्यादि। अर्थात् आज के युग में ISO Certification का प्रोटोकाल या प्रोसिजर बनाया जाता है वही बात, किन्तु एक विशाल स्तर पर, कल्पों में वर्णित है। व्याकरण हमें वाक्य रचना के विषय में बताता है। निरुक्त से हमें शब्दोंकी उत्पत्ति
का ज्ञान होता है। ज्योतिष नामक वेदांग से हमें नक्षत्र, ग्रह, उनकी गतियाँ तथा खगोल शास्त्र का ज्ञान होता है और छन्द की तो बात ही मत पूछो - किसी भी पढ़ाई को गाकर पढ़ने से वह तुरंत याद हो जाती है, दीर्घकाल तक समृति में रहती है। और उसका अच्छा आकलन भी होता है।वेद सूक्त भी छ्न्दबद्ध्र हैं और हमारा प्रायः ७० प्रतिशत वाड्मय छन्दबद्ध है। तो यह छन्दों की पढ़ाई भी छः वेदांगो में से एक है। इस सारी नियमवाली के कारण ही वेद लिखित रूप में न होने पर भी उनका प्रसार हुआ, लोगों ने उन्हें समझा और उनके ज्ञान से लाभिन्वित हुए।
शनिवार, 5 अप्रैल 2014
***व्याकरणकी मजेदार बातें 6, मई 2014-- देवपुत्र
व्याकरणकी मजेदार बातें 6 -- देवपुत्र मई 2014
May 2014
व्याकरण की मजेदार बातें
शब्दोंको जोड़ने की अद्भुत विधियाँ(भाग५)
-लीना मेहेंदले
बच्चो! आज हम संस्कृत और भारतीय भाषाओं का ऐसा चमत्कारी पक्ष देखेंगे जो संसार की दूसरी भाषाओं में नहीं हैं।दो या अधिक शब्दों को जोड़ने की दो अद्भुत विधियाँ हमारी भाषाओं में हैं जिन्हें हम सन्धि और समास के नाम से जानते हैं।
पहले शब्द का अंतिम अक्षर और दूसरे शब्द का पहला अक्षर ये दोनों मिलाकर इन शब्दों की संधि की जा सकती है।एक ओर एक जोड़कर।संन्धिके सामान्य उदाहरण हमें अपनी दैनंदिन भाषा में बारबार मिल जाते हैं जैसे- ‘स्वागत’ अर्थात् ‘सु’ और ‘आगत’ की सन्धि। ‘महेश’ अर्थात् ‘महा’ और ‘ईश’ की सन्धि।सन्धि के लिए पहले शब्द का अन्तिम अक्षर और दूसरे शब्द के पहले अक्षर को कुछ खास खास नियमों के अनुसार जोड़ा जाता है।महा+ ऋषि से बना महर्षि, वन + औषधि= वनोषधि।
परन्तु संस्कृत भाषा की विशेषता है कि ऐसी सामान्य सन्धि के अलावा विशेष सन्धि का भी चलन है जिसे समास कहेंगे जेसे शिवस्य और धनुष्यःजोड़कर बना शिवधनुष्यः। इसे हम हिन्दी में भी कह सकते है ‘शिव का धनुष’की जगह शिवधनुष।इसे समास कहते है। समास में जोड़े गए पदों को खोलकर विस्तार से उनका अर्थ बताने की प्रक्रियाको विग्रह कहते हैं।
समास का एक लाभ हैकिसी बात को सारांश या छोटे शब्दों से व्यक्त करना और दूसरा लाभ है लालित्य अर्थात् भाषा कासौन्दर्य बढ़ाना।
समास के लिए जब शब्दों को जोड़ा जाता है तब सन्धि की तरह उन्हें संयुक्त नहीं किया जाता बल्कि उनके भाव को जोड़ने जैसा कुछ किया जाता है।उदाहरण के लिए हम कुछ समास शब्द लेते हैं-
राजपुत्र अर्थात् राजा का पुत्र
रसोईघर अर्थात् रसोई के लिए बनाया घर (या कमरा)
आजीवन अर्थात् जीवन पर्यन्त
जैसी मतिहै वैसा - यथामथि
राम एवं कृष्ण- रामकृष्ण
इन शब्दों को बारिकी से देखने पर संधि और समास का अन्तर समझ में आता हैं।
सन्धि और समास को आगे भी कुछ अकों में देखते और समझते रहेंगे।
May 2014
व्याकरण की मजेदार बातें
शब्दोंको जोड़ने की अद्भुत विधियाँ(भाग५)
-लीना मेहेंदले
बच्चो! आज हम संस्कृत और भारतीय भाषाओं का ऐसा चमत्कारी पक्ष देखेंगे जो संसार की दूसरी भाषाओं में नहीं हैं।दो या अधिक शब्दों को जोड़ने की दो अद्भुत विधियाँ हमारी भाषाओं में हैं जिन्हें हम सन्धि और समास के नाम से जानते हैं।
पहले शब्द का अंतिम अक्षर और दूसरे शब्द का पहला अक्षर ये दोनों मिलाकर इन शब्दों की संधि की जा सकती है।एक ओर एक जोड़कर।संन्धिके सामान्य उदाहरण हमें अपनी दैनंदिन भाषा में बारबार मिल जाते हैं जैसे- ‘स्वागत’ अर्थात् ‘सु’ और ‘आगत’ की सन्धि। ‘महेश’ अर्थात् ‘महा’ और ‘ईश’ की सन्धि।सन्धि के लिए पहले शब्द का अन्तिम अक्षर और दूसरे शब्द के पहले अक्षर को कुछ खास खास नियमों के अनुसार जोड़ा जाता है।महा+ ऋषि से बना महर्षि, वन + औषधि= वनोषधि।
परन्तु संस्कृत भाषा की विशेषता है कि ऐसी सामान्य सन्धि के अलावा विशेष सन्धि का भी चलन है जिसे समास कहेंगे जेसे शिवस्य और धनुष्यःजोड़कर बना शिवधनुष्यः। इसे हम हिन्दी में भी कह सकते है ‘शिव का धनुष’की जगह शिवधनुष।इसे समास कहते है। समास में जोड़े गए पदों को खोलकर विस्तार से उनका अर्थ बताने की प्रक्रियाको विग्रह कहते हैं।
समास का एक लाभ हैकिसी बात को सारांश या छोटे शब्दों से व्यक्त करना और दूसरा लाभ है लालित्य अर्थात् भाषा कासौन्दर्य बढ़ाना।
समास के लिए जब शब्दों को जोड़ा जाता है तब सन्धि की तरह उन्हें संयुक्त नहीं किया जाता बल्कि उनके भाव को जोड़ने जैसा कुछ किया जाता है।उदाहरण के लिए हम कुछ समास शब्द लेते हैं-
राजपुत्र अर्थात् राजा का पुत्र
रसोईघर अर्थात् रसोई के लिए बनाया घर (या कमरा)
आजीवन अर्थात् जीवन पर्यन्त
जैसी मतिहै वैसा - यथामथि
राम एवं कृष्ण- रामकृष्ण
इन शब्दों को बारिकी से देखने पर संधि और समास का अन्तर समझ में आता हैं।
सन्धि और समास को आगे भी कुछ अकों में देखते और समझते रहेंगे।
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