
शुक्रवार, 19 नवंबर 2010
रविवार, 19 सितंबर 2010
Mi-prayog-shikale -- मी प्रयोग शिकले
मी प्रयोग शिकले -- लेख वाचण्यासाठी इथे टिचकवा
https://sites.google.com/site/balsahitya/many-more/Mi-prayog-shikale.pdf
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गुरुवार, 16 सितंबर 2010
पेड़ से कहो - "खुश रहो"
पेड़ से कहो - "खुश रहो"
(मेरी डायरी के पन्नों से)
भीषण गर्मी, अचानक शहर को तितर-बितर कर देनेवाली मूसलधार बारिश ! बादलों का फटना, बाढ़ के रेले और गाँव के गाँव उजड जाना । यही सब पिछले दो तीन वर्षों में बार बार हो रहा है । कहीं पर बादल भाग जाते हैं, पानी बरसाते नहीं और सूखा पडने से फसलें सूख जाती हैं । फिर हम चिन्तित हो जाते हैं कि देखो पर्यावरण कितना बिगड रहा है ।
रायपुर में मेरे कुछ मित्रों ने एक कार्यक्रम तय किया जिसमें स्कूली बच्चों को एक-एक पौधा दिया जायेगा, जिसे वे अपने-अपने घर के पास लगाएँगे और फिर उसकी देखभाल करेंगे । उसे रोज पानी से सीचेंगे, पशुओं से बचाएँगे और इस प्रकार वृक्ष का संवर्द्धन करेंगे । अनुमान है कि इस कार्यक्रम में करीब पचास हजार स्कूली बच्चे भाग लेंगे । उनके लिये एक निबंध प्रतियोगिता भी होगी जिसमें उन्हें लिखना है कि पर्यावरण क्यों बिगड रहा है और उसे बचाने के क्या-क्या उपाय हैं । फिर जीतनेवाले बच्चों को पुरस्कार दिया जायेगा । मैंने उन्हें सुझाव दिया कि एक प्रतियोगिता और चलाएँ । सभी बच्चे हर महिने एक छोटी स्थिति-दर्शक टिप्पणी लिखेंगे कि उनके पेड़ को कैसे बढ़ाया और अब पेड की हालत कैसी है । इन टिप्पणियों पर भी पुरस्कार दिया जाये ।

27 अगस्त को रायपुर में कार्यक्रम उद्घाटन हुआ । मुझे भी सबने आग्रह करके बुला लिया और बच्चों को संबोधित करने को कहा । मैंने देखा करीब चार सौ बच्चे थे - सभी ग्यारह, बारह वर्ष की आयु के । बच्चों को सबसे अधिक क्या पसंद है ? कहानी । सो मैंने भी उन्हें दो कहानियाँ सुनाईं । उन्हीं में से एक है - मछुवारे की कहानी जो मैं स्नेह के पाठकों को भी बताने जा रही हूँ ।
एक मछुवारा था । रोज समुद्र में जाना, जाल डालना और इन्तजार करना । मछलियाँ जाल में फँसती थीं । शाम को मछुवारा जाल समेटकर मछलियों को निकाल लेता । फिर उन्हें बाजार में बेचकर पैसे कमाता ।
एक दिन मछुवारा जाल फेंक कर बैठ गया था । तभी जाल में कुछ फँसा और जाल जोर-जोर से हिलने लगा । रुकने का नाम ही न ले । मछुवारे ने सोचा, जरूर कोई बड़ी मछली फँसी है । उसने जाल समेटना शुरू किया तो जाल बहुत भारी हो गया था । लेकिन कोई मछली नहीं दिखी । अन्त में जब पूरा जाल खींचकर बाहर कर लिया तो देखा एक छोटी सी बोतल फँसी हुई थी । दुखी होकर मछुवारे ने बोतल को हाथ में लिया, वह खाली दिख रही थी लेकिन बहुत भारी थी । ``क्या रहस्य हो सकता है, इतनी भारी बोतल का ?`` मछुवारा सोचने लगा । `` क्यों न इसे खोलकर देख लूँ ।``
ढक्कन बहुत ही कडाई से बंद किया गया था । जोर लगाकर मछुवारे ने उसे खोला 1 बोतल से हल्का सा धुआँ बाहर आने लगा । धीरे-धीरे धुआँ गहराने लगा, शोर बढ़ने लगा और फिर एक जिन प्रकट हुआ । उसने मछुवारे से कहा - ``अब मैं तुम्हें खाऊँगा ।``
मछुवारे ने पूछा - ``तुम कहाँ से आये हो और मुझे क्यों खाओगे ? मैंने तुम्हारा क्या बिगाडा है ?`` जिन बोला - `` मैं इस बोतल में बंद था । सदियों बंद रहा और यह बोतल समुद्र में इधर से उधर जाती रही । तभी मैंने सोच लिया कि जब मैं इस बोतल से निकलूँगा तो जो भी सबसे पहले सामने आयोगा, उसीको खा जाऊँगा । अब मेरे सामने तुम हो, तो मैं तुम्हें ही खाऊँगा ।``
मछुवारा पहले तो बड़ा घबराया । लेकिन उसका दिमाग चलने लगा । उसने जिन को डाँटा - `` झूठ बोलते हो तुम । शरम आनी चाहिये । इतने बड़े जिन होकर तुम इस बोतल में कैसे रह सके ? मैं नहीं मानता । तुम झूठे हो ।``
जिन को भी ताव आ गया । बोला मैं झूठा नहीं हूँ । तुम्हें विश्वास न हो तो अभी बोतल में वापस घुसकर दिखा सकता हूँ।``
और जिन फिर से धुआँ बन कर बोतल में घुस गया तो मछुवारे ने ढक्कन बंद कर दिया ।
इस प्रकार जिन वापस बोतल में बंद हो गया और मछुवारे का संकट टल गया । उसकी जान बची ।
तो बच्चों, हमारे आस-पास भी एक बोतल का जिन रहता है और वह पर्यावरण में छा जाता है, और हमारी जलवायु बिगाडता है, अकाल, सूखा तो कभी-कभी बाढ़ लाता है । लेकिन उस जिन को बंद किया जा सकता है , और बोतल हमारे पास है । तो बूझो पहेली कि वह जिन कौन है और वह बोतल कैसी है ?
बच्चों को कहानी बहुत पसंद आई लेकिन पहेली का उत्तर नहीं सूझा । अब यदि स्नेह के पाठकों में से किसी ने उत्तर समझ लिया हो तो समझ लो कि पर्यावरण बचाने की लड़ाई में वह सैनिक से कॅप्टन हो गया ।
तो बच्चों, वह जिन है - कार्बन डायऑक्साइड । क्योंकि जब वातावरण में कार्बन डायऑक्साइड बढ़ जाता है तो वह ग्लोबल वार्मिंग अर्थात् पृथ्वीमंडल को गरम करने लगता है । लेकिन यदि किसी तरह इस जिन को बाहर न घूमने दिया जाय, और बंद कर लिया जाय तो ग्लोबल वार्मिंग को रोका जा सकता है । और इस जिन को लिये जो बोतल उपयोगी है, उसका नाम है पेड़ - अर्थात् वृक्ष । ये अपने पत्तों से कार्बन डायऑक्साइड को सोख लेते हैं । फिर सूरज किरणों की सहायता से उसके कार्बन और ऑक्सीजन को अलग-अलग कर देते हैं । अब ऑक्सीजन तो वापस वातावरण में फेंक देते हैं, पर कार्बन को खाकर पचा जाते हैं । यही कार्बन पेड़ के तने में पेड़ की ऊर्जा के रूप में बंद पड़ा रहता है । वृक्ष की आयु जितनी बढ़ेगी, पेड़ के तने में अधिक- अधिक कार्बन जमा होता चला जायेगा । लेकिन जब हम पुराने पेड़ों को काटेंगे तो वही कार्बन नाम का जिन फिर खुले में आ जायेगा, फिर कार्बन डायऑक्साइड बनेगा और फिर से ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ायेगा ।

इसी लिये पेड़ों को कहो - खुश रहो, और कार्बन डायऑक्साइड के जिन को जकड कर बंद रख्खो। हम तुम्हें नहीं काटेंगे, और कार्बन को फँसा कर रखेंगे । खास कर लम्बी आयु वाले पुराने वृक्षों को तो और अधिक संभालेंगे । क्योंकि उनमें ज्यादा कार्बन बंद किया जा सकता है ।
कहानी से बच्चों को समझ में आ गया कि जिनको बोतल में वापस बंद करने के लिए उन्हें चाहिये पेड़ रूपी बोतल । लेकिन केवल स्कूल से पौधा ले जाकर अपने घर में लगाना काफी नहीं है । केवल उसे रोज पानी देकर बड़ा करना काफी नहीं है । उसे पानी के साथ-साथ प्यार भी देना है । उसे रोज सहलाना है - और कहना है, खुश रहो । जिन को पकड़ो, और पकड़े रहो ।
फिर तो बच्चे और भी खुश हुए और झट से अपनी अपनी कापियों में नया नारा लिख लिया ।
पेड़ से कहो - "खुश रहो"
- लीना मेहेंदले
(मेरी डायरी के पन्नों से)
भीषण गर्मी, अचानक शहर को तितर-बितर कर देनेवाली मूसलधार बारिश ! बादलों का फटना, बाढ़ के रेले और गाँव के गाँव उजड जाना । यही सब पिछले दो तीन वर्षों में बार बार हो रहा है । कहीं पर बादल भाग जाते हैं, पानी बरसाते नहीं और सूखा पडने से फसलें सूख जाती हैं । फिर हम चिन्तित हो जाते हैं कि देखो पर्यावरण कितना बिगड रहा है ।
रायपुर में मेरे कुछ मित्रों ने एक कार्यक्रम तय किया जिसमें स्कूली बच्चों को एक-एक पौधा दिया जायेगा, जिसे वे अपने-अपने घर के पास लगाएँगे और फिर उसकी देखभाल करेंगे । उसे रोज पानी से सीचेंगे, पशुओं से बचाएँगे और इस प्रकार वृक्ष का संवर्द्धन करेंगे । अनुमान है कि इस कार्यक्रम में करीब पचास हजार स्कूली बच्चे भाग लेंगे । उनके लिये एक निबंध प्रतियोगिता भी होगी जिसमें उन्हें लिखना है कि पर्यावरण क्यों बिगड रहा है और उसे बचाने के क्या-क्या उपाय हैं । फिर जीतनेवाले बच्चों को पुरस्कार दिया जायेगा । मैंने उन्हें सुझाव दिया कि एक प्रतियोगिता और चलाएँ । सभी बच्चे हर महिने एक छोटी स्थिति-दर्शक टिप्पणी लिखेंगे कि उनके पेड़ को कैसे बढ़ाया और अब पेड की हालत कैसी है । इन टिप्पणियों पर भी पुरस्कार दिया जाये ।

27 अगस्त को रायपुर में कार्यक्रम उद्घाटन हुआ । मुझे भी सबने आग्रह करके बुला लिया और बच्चों को संबोधित करने को कहा । मैंने देखा करीब चार सौ बच्चे थे - सभी ग्यारह, बारह वर्ष की आयु के । बच्चों को सबसे अधिक क्या पसंद है ? कहानी । सो मैंने भी उन्हें दो कहानियाँ सुनाईं । उन्हीं में से एक है - मछुवारे की कहानी जो मैं स्नेह के पाठकों को भी बताने जा रही हूँ ।
एक मछुवारा था । रोज समुद्र में जाना, जाल डालना और इन्तजार करना । मछलियाँ जाल में फँसती थीं । शाम को मछुवारा जाल समेटकर मछलियों को निकाल लेता । फिर उन्हें बाजार में बेचकर पैसे कमाता ।
एक दिन मछुवारा जाल फेंक कर बैठ गया था । तभी जाल में कुछ फँसा और जाल जोर-जोर से हिलने लगा । रुकने का नाम ही न ले । मछुवारे ने सोचा, जरूर कोई बड़ी मछली फँसी है । उसने जाल समेटना शुरू किया तो जाल बहुत भारी हो गया था । लेकिन कोई मछली नहीं दिखी । अन्त में जब पूरा जाल खींचकर बाहर कर लिया तो देखा एक छोटी सी बोतल फँसी हुई थी । दुखी होकर मछुवारे ने बोतल को हाथ में लिया, वह खाली दिख रही थी लेकिन बहुत भारी थी । ``क्या रहस्य हो सकता है, इतनी भारी बोतल का ?`` मछुवारा सोचने लगा । `` क्यों न इसे खोलकर देख लूँ ।``
ढक्कन बहुत ही कडाई से बंद किया गया था । जोर लगाकर मछुवारे ने उसे खोला 1 बोतल से हल्का सा धुआँ बाहर आने लगा । धीरे-धीरे धुआँ गहराने लगा, शोर बढ़ने लगा और फिर एक जिन प्रकट हुआ । उसने मछुवारे से कहा - ``अब मैं तुम्हें खाऊँगा ।``
मछुवारे ने पूछा - ``तुम कहाँ से आये हो और मुझे क्यों खाओगे ? मैंने तुम्हारा क्या बिगाडा है ?`` जिन बोला - `` मैं इस बोतल में बंद था । सदियों बंद रहा और यह बोतल समुद्र में इधर से उधर जाती रही । तभी मैंने सोच लिया कि जब मैं इस बोतल से निकलूँगा तो जो भी सबसे पहले सामने आयोगा, उसीको खा जाऊँगा । अब मेरे सामने तुम हो, तो मैं तुम्हें ही खाऊँगा ।``
मछुवारा पहले तो बड़ा घबराया । लेकिन उसका दिमाग चलने लगा । उसने जिन को डाँटा - `` झूठ बोलते हो तुम । शरम आनी चाहिये । इतने बड़े जिन होकर तुम इस बोतल में कैसे रह सके ? मैं नहीं मानता । तुम झूठे हो ।``
जिन को भी ताव आ गया । बोला मैं झूठा नहीं हूँ । तुम्हें विश्वास न हो तो अभी बोतल में वापस घुसकर दिखा सकता हूँ।``
और जिन फिर से धुआँ बन कर बोतल में घुस गया तो मछुवारे ने ढक्कन बंद कर दिया ।
इस प्रकार जिन वापस बोतल में बंद हो गया और मछुवारे का संकट टल गया । उसकी जान बची ।
तो बच्चों, हमारे आस-पास भी एक बोतल का जिन रहता है और वह पर्यावरण में छा जाता है, और हमारी जलवायु बिगाडता है, अकाल, सूखा तो कभी-कभी बाढ़ लाता है । लेकिन उस जिन को बंद किया जा सकता है , और बोतल हमारे पास है । तो बूझो पहेली कि वह जिन कौन है और वह बोतल कैसी है ?
बच्चों को कहानी बहुत पसंद आई लेकिन पहेली का उत्तर नहीं सूझा । अब यदि स्नेह के पाठकों में से किसी ने उत्तर समझ लिया हो तो समझ लो कि पर्यावरण बचाने की लड़ाई में वह सैनिक से कॅप्टन हो गया ।
तो बच्चों, वह जिन है - कार्बन डायऑक्साइड । क्योंकि जब वातावरण में कार्बन डायऑक्साइड बढ़ जाता है तो वह ग्लोबल वार्मिंग अर्थात् पृथ्वीमंडल को गरम करने लगता है । लेकिन यदि किसी तरह इस जिन को बाहर न घूमने दिया जाय, और बंद कर लिया जाय तो ग्लोबल वार्मिंग को रोका जा सकता है । और इस जिन को लिये जो बोतल उपयोगी है, उसका नाम है पेड़ - अर्थात् वृक्ष । ये अपने पत्तों से कार्बन डायऑक्साइड को सोख लेते हैं । फिर सूरज किरणों की सहायता से उसके कार्बन और ऑक्सीजन को अलग-अलग कर देते हैं । अब ऑक्सीजन तो वापस वातावरण में फेंक देते हैं, पर कार्बन को खाकर पचा जाते हैं । यही कार्बन पेड़ के तने में पेड़ की ऊर्जा के रूप में बंद पड़ा रहता है । वृक्ष की आयु जितनी बढ़ेगी, पेड़ के तने में अधिक- अधिक कार्बन जमा होता चला जायेगा । लेकिन जब हम पुराने पेड़ों को काटेंगे तो वही कार्बन नाम का जिन फिर खुले में आ जायेगा, फिर कार्बन डायऑक्साइड बनेगा और फिर से ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ायेगा ।

इसी लिये पेड़ों को कहो - खुश रहो, और कार्बन डायऑक्साइड के जिन को जकड कर बंद रख्खो। हम तुम्हें नहीं काटेंगे, और कार्बन को फँसा कर रखेंगे । खास कर लम्बी आयु वाले पुराने वृक्षों को तो और अधिक संभालेंगे । क्योंकि उनमें ज्यादा कार्बन बंद किया जा सकता है ।
कहानी से बच्चों को समझ में आ गया कि जिनको बोतल में वापस बंद करने के लिए उन्हें चाहिये पेड़ रूपी बोतल । लेकिन केवल स्कूल से पौधा ले जाकर अपने घर में लगाना काफी नहीं है । केवल उसे रोज पानी देकर बड़ा करना काफी नहीं है । उसे पानी के साथ-साथ प्यार भी देना है । उसे रोज सहलाना है - और कहना है, खुश रहो । जिन को पकड़ो, और पकड़े रहो ।
फिर तो बच्चे और भी खुश हुए और झट से अपनी अपनी कापियों में नया नारा लिख लिया ।
पेड़ से कहो - "खुश रहो"
- लीना मेहेंदले
मंगलवार, 10 मार्च 2009
गुलाबाच्या फुलाने यावे -10 तथा फूल- आओ, आओ
गुलाबाच्या फुलाने यावे
दै, लोकमत मधे दि 7 नार्च 2009 रोजी प्रकाशित
लहानपणी आम्ही एक खेळ खेळत असू - “गुलाबाच्या फुलाने यावे”. मजेदार खेळ होता हा. खेळाला कितीही मुली मुलं चालत असत आणि खेळही खूप वेळ चालत असे. खेळात दोन गट असत आणि प्रत्येक गटाचा एक राजा असे. खेळाचे जिंकणे- हरणे पुष्कळअंशी राजाच्या धोरणावरच अवलंबून असे .
खेळासाठी एका मोठया मैदानात 50 ते 100 मीटर अंतरावर दोन लांब रेषा आखून प्रत्येक रेषेवर एकेका गटातील सदस्यांना बसवले जात असे. खेळाच्या नियमानुसार उडया मारत खेळातील प्रत्येक खेळाडूनी दुसर्या रेषेपर्यंत पोचायचे आणि ज्या गटाचे सर्व खेळाडू अगोदर दुसर्या रेषेवर पोहोचतील तो गट विजयी होई.
पण लांब उडया मारण्याचा संधी कोणाला हाच खरा खेळ होता. प्रत्येक गटाचा राजा आपल्या खेळाडूुना एकेका फुलाचे नाव देत असे. गुलाब, झेंडु, जाई, जुई, कमळ, मोगरा इत्यादि. ही नावे अर्थातच दुसर्या गटातील खेळाडूंना माहित नसायची. आता समजा माझ्या गटाने खेळायला सुरुवात करायची आहे आणि मी राजा आहे, तर मी दुसर्या राजाला बोलवून माझ्या गटातील एका खेळाडूची निवड करणार. दुसरा राजा माझ्या गटातील खेळाडूचे डोळे झाकून आपल्या गटातील खेळाडूना म्हणेल “गुलाबाच्या फुलाने यावे, टिचकी मारुन जावे”.
यावर दुसर्या गटातील ज्या खेळाडूचे नाव गुलाब असेल तो येऊन माझ्या खेळाडूला एक टिचकी मारेल आणि परत आपल्या जागी जाऊन बसेल. आता माझ्या खेळाडूनी ओळखायचे आहे की, त्याला टिचकी कोणी मारली. जर त्याला ओळखता आले तर त्याला उडी मारुन आमच्या रेषेच्या पलीकडे जाण्याचा संधी मिळेल. अशा प्रकारे माझा एक खेळाडू पुढे जाईल आणि माझ्या गटातील सर्वांना कळेल की, दुसर्या गटातील गुलाबाचे फूल कोण आहे.
डाव अजूनही माझ्या गटाकडेच असेल. त्यामुळे मी पुन्हा एका खेळाडूची निवड करणार आणि दुसर्या गटाचा राजा पुन्हा येऊन त्याचे डोळे बंद करुन म्हणेल “झेंडुच्या फुलाने यावे टिचकी मारुन जावे”. अशा प्रकारे हा खेळ पुढे जात असे. जर माझ्या खेळाडूला टिचकी मारणार्याचे नाव ओळखता आले नाही तर आमच्या गटाकडील डाव निघून दुसर्या गटाकडे जात असे आणि मग त्यांच्या खेळाडूंना उडी मारुन पुढे यायचा संधी मिळत असे.
हा खेळ कितीही वेळ चालू शकतो. जितके खेळाडू जास्त आणि दोन रेघांमधील अंतर जास्त तितका खेळ जास्त वेळ चालणार. कधी कधी आम्ही दुपारी सुरुवात करुन दिवेलागणीपर्यंत हा खेळ खेळत असू.
- 2 -
या खेळात बहुतेक वेळा माझ्या गटाचा राजा मीच होत असे आणि बहुतेक वेळा आमचाच गट जिंकत असे. यासाठी माझे एक खास धोरण होते. मी नेहमी माझ्या गटातील लहान लिंबू-टिंबू खेळाडूना जास्त वेळा निवडून त्यांना जास्त वेळा लवकर पुढे जाण्याची संधी देत असे. दुसर्या गटाचे राजे बहुतेक वेळा उलट धोरण ठेवत असत. ते आधी आपल्या मोठया व पक्क्या खेळाडूना पुढे काढत असत. हे खेळाडू एकेका उडीतच मोठे अंतर ओलांडीत असत. त्यामुळे खेळाच्या सुरवातीलाच चित्र असे असायचे की, माझ्या गटातील कित्येक छोटे खेळाडू रेघेच्या बाहेर निघालेले आहेत. पण अजूनही त्यांनी थोडेसेच अंतर पार केलेले आहे. दुसर्या गटातील मोठे खेळाडू मात्र त्यांच्या रेघेच्या बाहेर निघून खूप अंतर पुढे आलेले आहेत.
पण थोडयाच वेळात चित्र उलट होत असे. एव्हाना माझे सर्व छोटे खेळाडू दुसर्या रेघेपर्यंत जावून पोहोचलेले असत आणि माझ्या मोठया खेळाडूंसाठी मला कमी उडयांची आवश्यकता असे. दुसर्या गटात मात्र मोठे खेळाडू माझ्या रेघेच्या जवळ आलेले असत किंवा कित्येकदा रेघ ओलांडून खेळातूनच बाहेर झालेले असत पण त्यांचे छोटे खेळाडू मात्र अजूनही खूप मागे रहात आणि त्यांच्या उडया छोटया छोटया असल्यामुळे पटापट पुढे येणे शक्य होत नसे. त्याचप्रमाणे दुसर्या गटातील जे खेळाडू रेघ ओलांडून जात त्यांना टिचकी मारण्यासाठी बोलावता येत नसल्याने उरलेल्या खेळाडूचे गुप्त नाव लक्षात ठेवणे सोपे होत असे.
या खेळातून मी एक गोष्ट शिकले. जर एकेकच खेळाडू मोजायचा असेल तर दुसर्या गटातील जास्त खेळाडू आमची रेघ ओलांडून गेलेले असत. त्यामुळे ते ते खेळाडू जिंकले पण गट मात्र हरला असे चित्र तयार होई. मात्र संपूर्ण गट जिंकायच्या दृष्टीने विचार केला तर सरतेशेवटी माझाच गट जिंकत असे. कारण आमच्या गटातील लहान मुलांना आम्ही आधीच पुढे काढलेले असे.
आजही आपल्याकडे आरक्षणाच्या मुद्यावर चर्चा होते तेव्हा मला हा खेळ आठवतो. ज्यांना असे वाटते की, आपला देश आणि समाज हा एकसंध देश आणि समाजाच्या रुपाने इतर देशापेक्षा पुढे यावा, त्यांना नेहमीच आपल्या समाजातील मागे पडलेल्या लोकांचा विचार पहिल्याने करावा लागेल. मागे पडणारी मंडळी मागे राहण्याचे कारण काहीही असो, सामाजिक असो अथवा आर्थिक किंवा स्त्री-पुरुष हे लिंगभेदाचे कारण असो किंवा आदिवासी असण्याचे कारण असो किंवा शहरी-ग्रामीण अथवा दुर्गम डोंगराळ भागाचे कारण असो. कुठल्याही कारणामुळे मागे पडलेल्या सर्व लोकांना एकत्रितपणे पुढे आणण्याचे धोरण चालवणारा देशच इतर देशांच्या तुलनेत पुढे येऊ शकतो. नाहीतर सर्व जगाच्या एकषष्ठांश इतकी मोठी लोकसंख्या असूनही आपण इतर देशांच्या तुलनेत मागेच राहू.
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दै, लोकमत मधे दि 7 नार्च 2009 रोजी प्रकाशित
लहानपणी आम्ही एक खेळ खेळत असू - “गुलाबाच्या फुलाने यावे”. मजेदार खेळ होता हा. खेळाला कितीही मुली मुलं चालत असत आणि खेळही खूप वेळ चालत असे. खेळात दोन गट असत आणि प्रत्येक गटाचा एक राजा असे. खेळाचे जिंकणे- हरणे पुष्कळअंशी राजाच्या धोरणावरच अवलंबून असे .
खेळासाठी एका मोठया मैदानात 50 ते 100 मीटर अंतरावर दोन लांब रेषा आखून प्रत्येक रेषेवर एकेका गटातील सदस्यांना बसवले जात असे. खेळाच्या नियमानुसार उडया मारत खेळातील प्रत्येक खेळाडूनी दुसर्या रेषेपर्यंत पोचायचे आणि ज्या गटाचे सर्व खेळाडू अगोदर दुसर्या रेषेवर पोहोचतील तो गट विजयी होई.
पण लांब उडया मारण्याचा संधी कोणाला हाच खरा खेळ होता. प्रत्येक गटाचा राजा आपल्या खेळाडूुना एकेका फुलाचे नाव देत असे. गुलाब, झेंडु, जाई, जुई, कमळ, मोगरा इत्यादि. ही नावे अर्थातच दुसर्या गटातील खेळाडूंना माहित नसायची. आता समजा माझ्या गटाने खेळायला सुरुवात करायची आहे आणि मी राजा आहे, तर मी दुसर्या राजाला बोलवून माझ्या गटातील एका खेळाडूची निवड करणार. दुसरा राजा माझ्या गटातील खेळाडूचे डोळे झाकून आपल्या गटातील खेळाडूना म्हणेल “गुलाबाच्या फुलाने यावे, टिचकी मारुन जावे”.
यावर दुसर्या गटातील ज्या खेळाडूचे नाव गुलाब असेल तो येऊन माझ्या खेळाडूला एक टिचकी मारेल आणि परत आपल्या जागी जाऊन बसेल. आता माझ्या खेळाडूनी ओळखायचे आहे की, त्याला टिचकी कोणी मारली. जर त्याला ओळखता आले तर त्याला उडी मारुन आमच्या रेषेच्या पलीकडे जाण्याचा संधी मिळेल. अशा प्रकारे माझा एक खेळाडू पुढे जाईल आणि माझ्या गटातील सर्वांना कळेल की, दुसर्या गटातील गुलाबाचे फूल कोण आहे.
डाव अजूनही माझ्या गटाकडेच असेल. त्यामुळे मी पुन्हा एका खेळाडूची निवड करणार आणि दुसर्या गटाचा राजा पुन्हा येऊन त्याचे डोळे बंद करुन म्हणेल “झेंडुच्या फुलाने यावे टिचकी मारुन जावे”. अशा प्रकारे हा खेळ पुढे जात असे. जर माझ्या खेळाडूला टिचकी मारणार्याचे नाव ओळखता आले नाही तर आमच्या गटाकडील डाव निघून दुसर्या गटाकडे जात असे आणि मग त्यांच्या खेळाडूंना उडी मारुन पुढे यायचा संधी मिळत असे.
हा खेळ कितीही वेळ चालू शकतो. जितके खेळाडू जास्त आणि दोन रेघांमधील अंतर जास्त तितका खेळ जास्त वेळ चालणार. कधी कधी आम्ही दुपारी सुरुवात करुन दिवेलागणीपर्यंत हा खेळ खेळत असू.
- 2 -
या खेळात बहुतेक वेळा माझ्या गटाचा राजा मीच होत असे आणि बहुतेक वेळा आमचाच गट जिंकत असे. यासाठी माझे एक खास धोरण होते. मी नेहमी माझ्या गटातील लहान लिंबू-टिंबू खेळाडूना जास्त वेळा निवडून त्यांना जास्त वेळा लवकर पुढे जाण्याची संधी देत असे. दुसर्या गटाचे राजे बहुतेक वेळा उलट धोरण ठेवत असत. ते आधी आपल्या मोठया व पक्क्या खेळाडूना पुढे काढत असत. हे खेळाडू एकेका उडीतच मोठे अंतर ओलांडीत असत. त्यामुळे खेळाच्या सुरवातीलाच चित्र असे असायचे की, माझ्या गटातील कित्येक छोटे खेळाडू रेघेच्या बाहेर निघालेले आहेत. पण अजूनही त्यांनी थोडेसेच अंतर पार केलेले आहे. दुसर्या गटातील मोठे खेळाडू मात्र त्यांच्या रेघेच्या बाहेर निघून खूप अंतर पुढे आलेले आहेत.
पण थोडयाच वेळात चित्र उलट होत असे. एव्हाना माझे सर्व छोटे खेळाडू दुसर्या रेघेपर्यंत जावून पोहोचलेले असत आणि माझ्या मोठया खेळाडूंसाठी मला कमी उडयांची आवश्यकता असे. दुसर्या गटात मात्र मोठे खेळाडू माझ्या रेघेच्या जवळ आलेले असत किंवा कित्येकदा रेघ ओलांडून खेळातूनच बाहेर झालेले असत पण त्यांचे छोटे खेळाडू मात्र अजूनही खूप मागे रहात आणि त्यांच्या उडया छोटया छोटया असल्यामुळे पटापट पुढे येणे शक्य होत नसे. त्याचप्रमाणे दुसर्या गटातील जे खेळाडू रेघ ओलांडून जात त्यांना टिचकी मारण्यासाठी बोलावता येत नसल्याने उरलेल्या खेळाडूचे गुप्त नाव लक्षात ठेवणे सोपे होत असे.
या खेळातून मी एक गोष्ट शिकले. जर एकेकच खेळाडू मोजायचा असेल तर दुसर्या गटातील जास्त खेळाडू आमची रेघ ओलांडून गेलेले असत. त्यामुळे ते ते खेळाडू जिंकले पण गट मात्र हरला असे चित्र तयार होई. मात्र संपूर्ण गट जिंकायच्या दृष्टीने विचार केला तर सरतेशेवटी माझाच गट जिंकत असे. कारण आमच्या गटातील लहान मुलांना आम्ही आधीच पुढे काढलेले असे.
आजही आपल्याकडे आरक्षणाच्या मुद्यावर चर्चा होते तेव्हा मला हा खेळ आठवतो. ज्यांना असे वाटते की, आपला देश आणि समाज हा एकसंध देश आणि समाजाच्या रुपाने इतर देशापेक्षा पुढे यावा, त्यांना नेहमीच आपल्या समाजातील मागे पडलेल्या लोकांचा विचार पहिल्याने करावा लागेल. मागे पडणारी मंडळी मागे राहण्याचे कारण काहीही असो, सामाजिक असो अथवा आर्थिक किंवा स्त्री-पुरुष हे लिंगभेदाचे कारण असो किंवा आदिवासी असण्याचे कारण असो किंवा शहरी-ग्रामीण अथवा दुर्गम डोंगराळ भागाचे कारण असो. कुठल्याही कारणामुळे मागे पडलेल्या सर्व लोकांना एकत्रितपणे पुढे आणण्याचे धोरण चालवणारा देशच इतर देशांच्या तुलनेत पुढे येऊ शकतो. नाहीतर सर्व जगाच्या एकषष्ठांश इतकी मोठी लोकसंख्या असूनही आपण इतर देशांच्या तुलनेत मागेच राहू.
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फूल-
आओ,
आओ
बचपन में हम
एक खेल खेलते थे-
फूल आओ आओ। वडा
मजेदार खेल था और इसकी कई
विशेषताएँ थीं।
खेल कुछ यों
था-
चाहें जितने
बच्चे हों,
जिस उमर के हों,
सब को दलों में
बाँटे लो। हर दल का एक राजा
हो। यह राजा ही अपने दल की
रणनीति को निर्धारित करेगा।
मैदान में
दूर-दूर
करीब पचास से सौ मीटर की दूरी
पर दो बडी लकीरें खींच कर एक
एक लकीर पर एक एक दल के सदस्यों
को बैठा दिया जाता था। खेल यही
था कि हर सदस्य को छलांगे लगाते
हुए दूसरे दल की लकीर तक पहुँचना
है,
और जिस दल के सभी
सदस्य दूसरे पाले में पिल
जायेंगे,
वही दल जीतेगा।
छलांग कौन लगा
सकता है और कैसे?
असल खेल
यही था। हरेक दल का राजा अपने
सदस्यों को एक एक फूल का नाम
दे देता था-
जैसे
गुलाब,
कमल,
गेंदा,
जूही,
चमेली इत्यादि।
ये नामदूसरे दल के सदस्यों
को नही बताये जाते थे।
अब मान लो पहले
दल को खेल आरंभ करना है और मैं
राजा हूँ। तो मैं अपना एक खिलाडी
चुन कर दूसरे राजा को बताऊँगी।
वह आकर मेरे खिलाडी की आँखे
बंद करेगा और अपने दल सदस्योंसे
कहेगा-
“चमेली
के फूल आओ,
आओ,
हल्की स्त्री
चपत मार कर जाओ।”
इस पर दूसरे
दल में जिसे चमेली फूल का नाम
दिया है वह आकर मेरे खिलाडी
को चपत मारेगा और वापस अपनी
जगह पर बैठ जायेगा।
अब मेरे खिलाडी
को पहचानना है कि उसे चपत किसने
मारी-
अर्थात्
दूसरे दल में चमेली का फूल कौन
था?
यदि वह पहचान
पाया तो उसे एक छलांग लगा कर
अपनी लकीर से आगेआ जाना है।
इस प्रकार मेरा एक खिलाडी आगे
बढ गया। पारी अब भी मेरा है
इसलिये अब मैं
किसी दूसरे खिलाडी का चुनाव
करूँगी। दूसरे दलका राजा
उसकीआँखेबंद करेगा और कहेगा-
गेंदेके फूल आओ
आओ,
हल्की सी चपत मार
कर जाओ। इस प्रकार खेल आगे
चलेगा। यदि मेरा खिलाडी पहचानने
में चूक कर गया कि उस किसने
चपट मारी तो पाटी मेरे हाथ से
निकलकर दूसरे राजा के हाथ चली
जायगी। इस प्रकार उसके खिलाडियों
को आगे आने का मौका मिलेगा।
खेल कितनी देर
चलेगा?
पालेकी
जितने अधिक खिलाडी होंगे और
दो लकीरें जितनी दूर होंगी-
उसी हिसाब
के खेल जल्दी या देर से खतम
होगा।मुझे याद है कि कभी कभी
हम तीन चार घंटे यही खेल खेलते
थे और पूरी शाम निकल जाती।
इस खेलमें मैं
अक्सर राजा की भूमिका निभाती
थी और मेरा दल हमेशा जीतता था।
इसकी एक खास वजह थी। मैं हमेशा
अपने दल के
छोटे खिलाडियों
को अधिक मौका देती और पहले
उन्हीं को आगे जाने की नीति
अपनाती थी। दूसरे दल के राजालोग
अक्सर इससे उलटा पहले अपने
बडे खिलाडियों को आगे आने का
मौका देते जो लम्बी लम्बी
छलांगों में बडी बडी दूरियाँ
पार करते थे। इसलिये खेल की
शुरुआत में चित्र यही दीखता
था कि मेरे दल के कई छोटे सदस्य
थोडा थोडा अंतर काट कर अब भी
मेरी के आसपास ही हैं जबकी
दूसरे दलके बडे सदस्य अपनी
लकीर से काफी आगे निकल आये
हैं।
लेकिन आधा खेल
दीते बीतते बाजी पलट जाती थी।
मेरे छोटे खिलाडी दूसरी लकीर
के पास पहुँचे होते थे और बडे
खिलाडियों को पार कराने के
लिये कम मौकोंकी जरूरत होती
थी जबकि दूसरे दल के बडे खिलाडी
मेरी लकीर को पार कर खेल से
बाहर निकल चुके होते थेलेकिन
छोटे सदस्य काफी पीछे रह जाते
जिन्हें जल्दी जल्दी आगे लाना
संभव नही था। साथ ही दूसरे दल
के जो सदस्य लकीर पार कर जाते
उन्हें चपत मारने के लिये नही
बुलाया जा सकता था। सो बाकी
खिलाडियों के नाम याद करना
आसान हो जाता था।
इस खेल से मैंने
एक बात सीखी-
यदि हम एक एक
खिलाडी की बात करते हैं तो
किसी भी समय देखा जा सकता था
कि दूसरे दल के ज्यादा सदस्य
लकीर पार कर चुके हैं लेकिन
जब दल के जीतने की बात आती थी
तब वही दल जीतता जिसने छोटोंको
भी मौका देकर आगे निकलवाया
हो।
आज जब मैं आरक्षण
के नाम पर चलने वाली चर्चा को
सुनती हूँ-
खासकर विरोध
को तो मुझे यह खेल याद आता है।
हमें तय करना होगा कि एक देश
की,
एक दलकी
हैसियत से हम एक साथ आगे आना
चाहते हैं या नही?
यदि हमें
अपने देश को दूसरे देशकी तुलना
में आगे
लाना है तो उनका
विचार अवश्य करना होगा जो किसी
भी कारण से पिछड रहे हैं-
चाहे वह सामाजिक
कारण हो,
आर्थिक गरीबी
का कारण हो,
स्त्री-पुरुष
भेद का कारण हो,
आदिवासी होने
का कारण हो या शहरी-गँवाई
भेद का कारण हो। पूरे समाज के
पिछडेपन को मिटाकर सबको आगे
ले जानेकी नीति बनानेवाला
देश ही दूसरे देशों के मुकाबले
आगे निकलेगा। अन्यथा विश्व
आबादी का छठवाँ हिस्सा अपने
पास होते हुए भी हम पिछडे ही
रह जायेंगे।
लीना
मेहेंदले
E/18,
बापूधाम,
चाणक्यपुरी,
नई दिल्ली
मनु आणी नोहा -09
मनु आणी नोहा
दै, लोकमत मधे दि 28 फेब्रु.2009 रोजी प्रकाशित
माणसाच्या आयुष्याच्या तुलनेत पृथ्वीचे आयुष्य खूपखूप मोठे आहे. अगदी अब्जावधी वर्षांचे. या आयुष्यात कित्येक उलाढाली होत राहतात. प्रलय काळ ही पण अशीच एक उलाढाल मानली जाते. प्रलय काळाच्या कित्येक भारतीय व ग्रीक पूराण कथा आपल्याला वाचायला मिळतात. त्यातीलच एक कथा मनू राजाची. एकदा मनू राजा नदीत आंघोळ करत असताना एक पिटुकला मासा त्याच्या जवळ येऊन म्हणाला “एवढया मोठया नदीत मी घाबरतो म्हणून तू मला उचलून एखादया छोटयाशा ठिकाणी सुरक्षित ठेव.” मनू राजाने माश्याला ओंजळीत उचलून घेतले आणि एका छोटया भांडयात ठेवुन दिले. चार दिवसातच तो मासा मोठा झाला आणि मनू राजाला म्हणाला आता तू मला थोडया मोठया जागेवर नेऊन ठेव. मग मनूने त्याला एका छोटया तलावात नेऊन ठेवले. काही दिवसांनी मासा तेथेही मोठा झाला. त्याच्या आग्रहावरुन मनूने त्याला एका मोठया तलावात ठेवले.
अशा प्रकारे मासा वाढतच राहिला आणि मनू राजा त्याला लहान पाण्यातून मोठया पाण्यात ठेवत राहिला. शेवटी मासा इतका मोठा झाला की, त्याने मनूला मला समुद्रात नेऊन सोड असा आग्रह धरला. मनूने त्याप्रमाणे केले.
काही वर्षानंतर तो मासा पुन्हा मनूकडे आला आणि म्हणाला “राजा लवकरच मोठा जलप्रलय येणार आहे. त्यावेळी ही सर्व पृथ्वी पाण्याखाली बुडेल म्हणून तू आताच तयारीला लाग. एक मोठी नाव बनव. खूपशा झाडांच्या बिया गोळा कर. सर्व प्रकारचे प्राणी पक्षी आपल्याबरोबर घे आणि समुद्र किनारी येऊन मला हाक मार म्हणजे मी तुझ्या मदतीला येईन.” मनूने त्याप्रमाणे केले. जलप्रलय सुरु झाल्यानंतर मासा मनूच्या नावेजवळ आला. एव्हाना तो मासा खूप मोठा होऊन त्याला एक शिंगही उगवले होते. मनूने माश्याच्या शिंगाला आपली नाव बांधली. माश्याकडे अफाट शक्ती होती. एवढया मोठया जलप्रलयातही तो नाव ओढत घेऊन गेला. एका उंच पर्वताचे फक्त शेवटचे टोकच बुडायचे शिल्लक राहिले होते. त्या टोकाला मनू राजाची नाव नेऊन बांधली. बर्याच दिवसांनी जलप्रलय ओसरल्यावर मनूने त्याच्या बरोबर आणलेले सर्व पशुपक्षी, प्राण्यांच्या प्रजाती, माणसे आणि झाडांच्या बिया यांच्या सहाय्याने पुन्हा पृथ्वीवर नवीन संसार उभारला. या गोष्टीतील नावेलाच ग्रीक कथेमध्ये “नोहाज आर्क ” असे म्हटले जाते व ती चांदण्याच्या स्वरुपात आकाशात कुठे दिसते हे मी पुढील अंकात सांगेन.
या गोष्टीवरुन आपल्याला कळते की, पुढील संकटाची चाहूल घेवुन नीट तयारी केली तर संकटानंतरची उभारणी नीट करता येते.
जलप्रलयानंतर थंडीची लाट आणि बर्फ युग येते. त्या काळात खूपसा कार्बन पृथ्वीच्या पोटात दडून राहतो. त्याचे स्वरुप कोळसा, पेट्रोलियम पदार्थ आणि खनिजांचे कार्बोनेट असे असते. पण पृथ्वीच्या वरही कार्बन असतो. घन स्वरुपाचा कार्बन जीवसृष्टी आणि झाडांच्या रुपात राहतो. पण वायु रुपातला कार्बन म्हणजे कार्बनडायऑक्साईड. कार्बन व कार्बनडायऑक्साईडचे संतुलन छान टिकून राहते. जेवढया प्रमाणात घन कार्बन असेल तेवढयाच प्रमाणात कार्बनडायऑक्साईडही असतो. सुमारे दोनशे वर्षापूर्वी पर्यंत हीच स्थिती होती.
परंतु माणसाने एक मोठा प्रश्न निर्माण केला. एकोणीसाव्या शतकात आलेल्या औद्योगिक क्रांतीने चित्र पालटले. आता उद्योगक्षेत्रात मोठ्या प्रमाणात वस्तुंची निर्मिती होउ लागली. यासाठी त्यांना इंधनाची आवश्यकता भासली. म्हणून जमिनीखालून कोळसा काढावा लागला. त्याचबरोबर खनिज पदार्थांचीही आवश्यकता भासली आणि पृथ्वीच्या पोटातून खनीज काढून त्याचे शुध्दीकरण करण्यासाठी फॅक्टरी काढाव्या लागल्या. तिथे धातू तयार होतांना कार्बोनेटच्या रुपातील कार्बन डायऑक्साईड बाहेर पडून परत वातावरणात मिसळू लागला.
विसाव्या शतकाच्या सुरुवातीलाच खनिज तेलाचा शोध लागला. जमिनीतून मोठ्या प्रमाणात क्रुड ऑईल पण काढलं जाऊ लागलं. त्यापासून पेट्रोल, डिझेल, केरोसिन. एल.पी.जी.गॅस (घरगुती गॅस) इत्यादी बनविले जाऊ लागले. या इंधनांचा वापर उद्योगधंद्यासाठी, वाहने चालविण्यासाठी तसेच घरगुती वापराकरिता होऊ लागला.

आज जगामध्ये प्रतिवर्षी ३६० कोटी टन खनिज तेल, २०० कोटी टन तेलाच्या इतका गॅस तसेच २४० कोटी टन तेलाइतका कोळसा जमिनीच्या पोटातून बाहेर काढून, तो जमिनीवर आणला जातो. यामुळे पृथ्वीवरील कार्बनमध्ये प्रति दिवशी मोठ्या प्रमाणांत वाढ होत आहे. वातावरणातील कार्बन डायऑक्साइड मध्येही वाढ होत आहे. त्यामुळे सूर्याची उष्णता अडविली जाउन तापमानही वाढत आहे. मनुष्याकडे कार्बनला हवेमध्ये सोडून देण्याच्या शंभर वाटा आहेत. जास्त कोळसा, जास्त खनिजं आणी जास्त पेट्रोलियम पदार्थांची खपत हे ते उवाय. परंतु परतीचा वाट एकच आहे. ती म्हणजे वृक्ष. ते असतील तरच हे काम होईल. वृक्षांचा आणखी एक फायदा हा आहे की, इंधनासाठी झाडाची लाकडे, पाने उपयोगात येतील व पृथ्वीच्या पोटात असलेला खनिज तेलाचा साठा, कोळसा इत्यादी एवढ्या मोठ्या प्रमाणांत काढावे लागणार नाहीत. म्हणजेच कार्बनला बाहेर न काढता पृथ्वीच्या पोटातच ठेवून आपण वातावरणाला वाचवू शकू.
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दै, लोकमत मधे दि 28 फेब्रु.2009 रोजी प्रकाशित
माणसाच्या आयुष्याच्या तुलनेत पृथ्वीचे आयुष्य खूपखूप मोठे आहे. अगदी अब्जावधी वर्षांचे. या आयुष्यात कित्येक उलाढाली होत राहतात. प्रलय काळ ही पण अशीच एक उलाढाल मानली जाते. प्रलय काळाच्या कित्येक भारतीय व ग्रीक पूराण कथा आपल्याला वाचायला मिळतात. त्यातीलच एक कथा मनू राजाची. एकदा मनू राजा नदीत आंघोळ करत असताना एक पिटुकला मासा त्याच्या जवळ येऊन म्हणाला “एवढया मोठया नदीत मी घाबरतो म्हणून तू मला उचलून एखादया छोटयाशा ठिकाणी सुरक्षित ठेव.” मनू राजाने माश्याला ओंजळीत उचलून घेतले आणि एका छोटया भांडयात ठेवुन दिले. चार दिवसातच तो मासा मोठा झाला आणि मनू राजाला म्हणाला आता तू मला थोडया मोठया जागेवर नेऊन ठेव. मग मनूने त्याला एका छोटया तलावात नेऊन ठेवले. काही दिवसांनी मासा तेथेही मोठा झाला. त्याच्या आग्रहावरुन मनूने त्याला एका मोठया तलावात ठेवले.
अशा प्रकारे मासा वाढतच राहिला आणि मनू राजा त्याला लहान पाण्यातून मोठया पाण्यात ठेवत राहिला. शेवटी मासा इतका मोठा झाला की, त्याने मनूला मला समुद्रात नेऊन सोड असा आग्रह धरला. मनूने त्याप्रमाणे केले.
काही वर्षानंतर तो मासा पुन्हा मनूकडे आला आणि म्हणाला “राजा लवकरच मोठा जलप्रलय येणार आहे. त्यावेळी ही सर्व पृथ्वी पाण्याखाली बुडेल म्हणून तू आताच तयारीला लाग. एक मोठी नाव बनव. खूपशा झाडांच्या बिया गोळा कर. सर्व प्रकारचे प्राणी पक्षी आपल्याबरोबर घे आणि समुद्र किनारी येऊन मला हाक मार म्हणजे मी तुझ्या मदतीला येईन.” मनूने त्याप्रमाणे केले. जलप्रलय सुरु झाल्यानंतर मासा मनूच्या नावेजवळ आला. एव्हाना तो मासा खूप मोठा होऊन त्याला एक शिंगही उगवले होते. मनूने माश्याच्या शिंगाला आपली नाव बांधली. माश्याकडे अफाट शक्ती होती. एवढया मोठया जलप्रलयातही तो नाव ओढत घेऊन गेला. एका उंच पर्वताचे फक्त शेवटचे टोकच बुडायचे शिल्लक राहिले होते. त्या टोकाला मनू राजाची नाव नेऊन बांधली. बर्याच दिवसांनी जलप्रलय ओसरल्यावर मनूने त्याच्या बरोबर आणलेले सर्व पशुपक्षी, प्राण्यांच्या प्रजाती, माणसे आणि झाडांच्या बिया यांच्या सहाय्याने पुन्हा पृथ्वीवर नवीन संसार उभारला. या गोष्टीतील नावेलाच ग्रीक कथेमध्ये “नोहाज आर्क ” असे म्हटले जाते व ती चांदण्याच्या स्वरुपात आकाशात कुठे दिसते हे मी पुढील अंकात सांगेन.
या गोष्टीवरुन आपल्याला कळते की, पुढील संकटाची चाहूल घेवुन नीट तयारी केली तर संकटानंतरची उभारणी नीट करता येते.
जलप्रलयानंतर थंडीची लाट आणि बर्फ युग येते. त्या काळात खूपसा कार्बन पृथ्वीच्या पोटात दडून राहतो. त्याचे स्वरुप कोळसा, पेट्रोलियम पदार्थ आणि खनिजांचे कार्बोनेट असे असते. पण पृथ्वीच्या वरही कार्बन असतो. घन स्वरुपाचा कार्बन जीवसृष्टी आणि झाडांच्या रुपात राहतो. पण वायु रुपातला कार्बन म्हणजे कार्बनडायऑक्साईड. कार्बन व कार्बनडायऑक्साईडचे संतुलन छान टिकून राहते. जेवढया प्रमाणात घन कार्बन असेल तेवढयाच प्रमाणात कार्बनडायऑक्साईडही असतो. सुमारे दोनशे वर्षापूर्वी पर्यंत हीच स्थिती होती.
परंतु माणसाने एक मोठा प्रश्न निर्माण केला. एकोणीसाव्या शतकात आलेल्या औद्योगिक क्रांतीने चित्र पालटले. आता उद्योगक्षेत्रात मोठ्या प्रमाणात वस्तुंची निर्मिती होउ लागली. यासाठी त्यांना इंधनाची आवश्यकता भासली. म्हणून जमिनीखालून कोळसा काढावा लागला. त्याचबरोबर खनिज पदार्थांचीही आवश्यकता भासली आणि पृथ्वीच्या पोटातून खनीज काढून त्याचे शुध्दीकरण करण्यासाठी फॅक्टरी काढाव्या लागल्या. तिथे धातू तयार होतांना कार्बोनेटच्या रुपातील कार्बन डायऑक्साईड बाहेर पडून परत वातावरणात मिसळू लागला.
विसाव्या शतकाच्या सुरुवातीलाच खनिज तेलाचा शोध लागला. जमिनीतून मोठ्या प्रमाणात क्रुड ऑईल पण काढलं जाऊ लागलं. त्यापासून पेट्रोल, डिझेल, केरोसिन. एल.पी.जी.गॅस (घरगुती गॅस) इत्यादी बनविले जाऊ लागले. या इंधनांचा वापर उद्योगधंद्यासाठी, वाहने चालविण्यासाठी तसेच घरगुती वापराकरिता होऊ लागला.
आज जगामध्ये प्रतिवर्षी ३६० कोटी टन खनिज तेल, २०० कोटी टन तेलाच्या इतका गॅस तसेच २४० कोटी टन तेलाइतका कोळसा जमिनीच्या पोटातून बाहेर काढून, तो जमिनीवर आणला जातो. यामुळे पृथ्वीवरील कार्बनमध्ये प्रति दिवशी मोठ्या प्रमाणांत वाढ होत आहे. वातावरणातील कार्बन डायऑक्साइड मध्येही वाढ होत आहे. त्यामुळे सूर्याची उष्णता अडविली जाउन तापमानही वाढत आहे. मनुष्याकडे कार्बनला हवेमध्ये सोडून देण्याच्या शंभर वाटा आहेत. जास्त कोळसा, जास्त खनिजं आणी जास्त पेट्रोलियम पदार्थांची खपत हे ते उवाय. परंतु परतीचा वाट एकच आहे. ती म्हणजे वृक्ष. ते असतील तरच हे काम होईल. वृक्षांचा आणखी एक फायदा हा आहे की, इंधनासाठी झाडाची लाकडे, पाने उपयोगात येतील व पृथ्वीच्या पोटात असलेला खनिज तेलाचा साठा, कोळसा इत्यादी एवढ्या मोठ्या प्रमाणांत काढावे लागणार नाहीत. म्हणजेच कार्बनला बाहेर न काढता पृथ्वीच्या पोटातच ठेवून आपण वातावरणाला वाचवू शकू.
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शनिवार, 14 फ़रवरी 2009
पृथ्वीच्या पोटातला कार्बन काढू या नको. -08
पृथ्वीच्या पोटातला कार्बन काढू या नको.
लीना मेंहदळे
leena.mehendale@gmail.com
published in Lokmat on 21 Feb 2009
कांही वर्षापूर्वी आपल्याकडे त्सुनामी लाट आली, नंतर अमेरिकेमध्ये कतरिनाची तुफानी लाट आली. हे आपल्याला काय संकेत देतात ? दोन वर्षापूर्वी गुजरात, नंतर बिहार व मध्यप्रदेश मग लगेच मुंबई, महाराष्ट्र व कर्नाटक आणि मध्यप्रदेश ही सतत पूरजन्य परिस्थितीत होती. या सर्व घटना कोणत्या नैसर्गिक कारणांना जोडलेल्या आहेत ? यावर विचार करण्याची जबाबदारी आज सर्वांची आहे, मग ती सामान्य माणसं असोत की सरकार असो..
मनुष्य हा निरंतर विकास करणारा प्राणी आहे. प्रगती आणि विकासासाठी पृथ्वी, अंतराळासहित सर्व महाभूतांवर विजय मिळविण्याची मानवाची क्षमता आहे. परंतु अंधाधुंद विजय मिळविण्याने उन्नती होत नाही. यश पचविणे, त्याला आत्मसात करणे आणि त्यातून चिरस्थायी प्रगतीची घडी कशी बसेल हे पाहाणे महत्वाचे आहे. मनुष्याने निसर्गावर विजय मिळविला असेल देखील, पण जर तो आत्मसात करुन निसर्गाबरोबर सामंजस्य ठेवले नाही तर निसर्ग सुध्दा बदला घेतल्याशिवाय राहात नाही, हेच वरील घटना दाखवितात.
दोन तीनशे वर्षापूर्वी पासूनच्या इतिहासात जागतिक तापमानाचा ग्राफ खालून वर असा होता. याचा अर्थ असा की पृथ्वीवर वायुमंडळाचे तापमान वाढतच राहिले आहे. परंतु त्यातल्या त्यांत मागील शंभर वर्षात तपमानात खूपच वाढ झाली आहे. या तापमानाच्या वाढीचे परिणाम त्सुनामी, कतरिनाच्या स्वरुपात दिसू लागते. तसेच कित्येक राज्याने पूरस्थिती देखील सोसली आहे त्याचेही कारण हेच. पण तापमान का वाढते ? याचे कारण समजणे खूप सोपे आहे.
पृथ्वीच्या पोटामध्ये खूप प्रमाणात कार्बन आहे आणी पृष्ठभागवर पण आहे.. संपूर्ण जीवसृष्टीचा आधारच कार्बन आहे. हा कार्बन ज्वलनशील आहे. ऑक्सीजनमध्ये कार्बनचे ज्वलन झाल्यावर कार्बन डायऑक्साईड बनतो, आणि या प्रक्रियेतूनच उष्णता बाहेर पडते. ती जर आपण पकडू शकलो तर तिचा उपयोग इंधन किंवा विजेसाठी करु शकतो. आपल्या दैनंदिन व्यवहारासाठी इंधन हे महत्वाचे आहे. उदा. कोळसा, लाकडे, स्वयपांकाचा गॅस, पेट्रोल, डिझेल, फ्युएल ऑईल आणि रॉकेल या सर्व इंधनात कार्बनचे मोठे प्रमाण असते,
पृथ्वीवर जो कांही कार्बन आहे, त्याचे आपले एक चक्र बनलेले आहे. जेव्हा कार्बन जळतो, तेव्हा तो कार्बन डायऑक्साइड बनतो आणि वातावरणात सामावून जातो. तेथूनच मग वृक्ष आपल्या श्वासाबरोबर त्याला आत घेतात आणि उन्हाच्या मदतीने कार्बन व ऑक्सीजन वेगवेगळे करतात. तो ऑक्सीजन पुन्हा वातावरणात सोडला जातो, आणि आपल्याला श्वासासाठी शुध्द हवा मिळते. कार्बन हा घन पदार्थाच्या रुपाने झाडांची पाने, फुले व बीयांमध्ये राहतो. या सर्व वनस्पतीजन्य गोष्टींना इतर जीवसृष्टी खाते आणि तो कार्बन त्यांच्या शरीराचा एक हिस्सा बनतो. ते प्राणी मेल्यावर त्यांचे र्निजीव शरीर जेव्हां सडेल, गळून पडेल किंवा जळेल तेव्हां त्यातून कार्बन डायऑक्साईड निघून हवेत मिसळेल, मग ते जीव-जन्तु असोत, झाडे-झुडपे असोत किंवा मानव प्राणी असो. किंवा त्यातील कांही कार्बन डायऑक्साइड मातीमध्ये मिळून जातो, आणि खनिजांच्या कार्बोनेटच्या स्वरुपात तेथे राहतो. जेव्हा आपण खनिज पदार्थांपासून धातू निर्माण करतो जसे लोखंड, तांबे, अल्युमिनियम इत्यादी, तेव्हा त्यांच्याबरोबर असलेला कार्बन डायऑक्साइड बाहेर पडून हवेमध्ये परत जातो.
अशाप्रकारे वातावरणातून झाडांमध्ये, तेथून प्राणीमात्रांच्या शरीरामध्ये आणि तेथून कार्बोनेटच्या रुपात मातीमध्ये कार्बन परत येतो. किंवा झाडं किंवा प्राणांचे शरीर सडून गेल्यावर परत कार्बन डायऑक्साइडच्या रुपात वातावरणात मिसळतो. अशाप्रकारे कार्बनचे चक्र चालू रहाते.
सूर्याच्या किरणांनी पृथ्वीवर उष्णता येते. त्यासाठी कार्बन डायऑक्साइड एकप्रकारे दरवाजाचे (संरक्षणाचे) काम करते. सूर्य किरणांपासून मिळणारी उष्णता पृथ्वीच्या आवरणातील अनेक अडथळे पार करुन पृथ्वीपर्यंत येऊन पोहोचते. परंतु हीच उर्जा रात्री अवरक्त किरणांच्या (Infra Red Rays) रुपात पुन्हा पृथ्वीच्या वातारणाच्या बाहेर जाऊ पहात असेल तर कार्बन डायऑक्साइडचा थर तिला मोठ्या प्रमाणांत अडवू शकतो.
ज्या दिवशी वातावरणांत कार्बन डायऑक्साइडची पातळी कमी असेल, तेव्हां तो उष्णतेला बाहेर जाऊ देतो आणि त्यामुळे वातावरणाचे तपमान वाढत नाही. काच पण अशाच प्रकारे दरवाजाचे काम करते. म्हणून तिचा उपयोग ग्रीन हाऊसमध्ये केला जातो. तेथे तो गुण लाभदायक आहे. परंतु जेव्हां कार्बन डायऑक्साइड वातावरणात मोठ्या प्रमाणात वाढतो, तेव्हां जागतिक तपमानात वाढ होते, व त्यामुळे पर्वतावर जमा झालेला बर्फ वितळायला लागतो. त्यामुळे पूर व तुफानासारखी परिस्थिती निर्माण होते.
यावरुन हेही महत्वाचे लक्षांत येते की, पृथ्वीच्या पृष्ठभागाच्या बाहेर जो कार्बन आहे, त्याची कार्बन डायऑक्साइड आणि कार्बन अशी वाटणी आहे, त्या दोन्ही मध्ये संतुलन राहते. कार्बन डायऑक्साइडला वृक्षांनी शोषून घेतले तर वातारणातील तपमानांत वरचेवर वाढ होणार नाही. अशाप्रकारे झाडं-झुडपांच्या सहाय्याने कार्बन चक्राचे संतुलन व्यवस्थित राहते.
मग आता वेळ कशाला दवडायचा ? चला तर आपणही वृक्षारोपण करु या.
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लीना मेंहदळे
leena.mehendale@gmail.com
published in Lokmat on 21 Feb 2009
कांही वर्षापूर्वी आपल्याकडे त्सुनामी लाट आली, नंतर अमेरिकेमध्ये कतरिनाची तुफानी लाट आली. हे आपल्याला काय संकेत देतात ? दोन वर्षापूर्वी गुजरात, नंतर बिहार व मध्यप्रदेश मग लगेच मुंबई, महाराष्ट्र व कर्नाटक आणि मध्यप्रदेश ही सतत पूरजन्य परिस्थितीत होती. या सर्व घटना कोणत्या नैसर्गिक कारणांना जोडलेल्या आहेत ? यावर विचार करण्याची जबाबदारी आज सर्वांची आहे, मग ती सामान्य माणसं असोत की सरकार असो..
मनुष्य हा निरंतर विकास करणारा प्राणी आहे. प्रगती आणि विकासासाठी पृथ्वी, अंतराळासहित सर्व महाभूतांवर विजय मिळविण्याची मानवाची क्षमता आहे. परंतु अंधाधुंद विजय मिळविण्याने उन्नती होत नाही. यश पचविणे, त्याला आत्मसात करणे आणि त्यातून चिरस्थायी प्रगतीची घडी कशी बसेल हे पाहाणे महत्वाचे आहे. मनुष्याने निसर्गावर विजय मिळविला असेल देखील, पण जर तो आत्मसात करुन निसर्गाबरोबर सामंजस्य ठेवले नाही तर निसर्ग सुध्दा बदला घेतल्याशिवाय राहात नाही, हेच वरील घटना दाखवितात.
दोन तीनशे वर्षापूर्वी पासूनच्या इतिहासात जागतिक तापमानाचा ग्राफ खालून वर असा होता. याचा अर्थ असा की पृथ्वीवर वायुमंडळाचे तापमान वाढतच राहिले आहे. परंतु त्यातल्या त्यांत मागील शंभर वर्षात तपमानात खूपच वाढ झाली आहे. या तापमानाच्या वाढीचे परिणाम त्सुनामी, कतरिनाच्या स्वरुपात दिसू लागते. तसेच कित्येक राज्याने पूरस्थिती देखील सोसली आहे त्याचेही कारण हेच. पण तापमान का वाढते ? याचे कारण समजणे खूप सोपे आहे.
पृथ्वीच्या पोटामध्ये खूप प्रमाणात कार्बन आहे आणी पृष्ठभागवर पण आहे.. संपूर्ण जीवसृष्टीचा आधारच कार्बन आहे. हा कार्बन ज्वलनशील आहे. ऑक्सीजनमध्ये कार्बनचे ज्वलन झाल्यावर कार्बन डायऑक्साईड बनतो, आणि या प्रक्रियेतूनच उष्णता बाहेर पडते. ती जर आपण पकडू शकलो तर तिचा उपयोग इंधन किंवा विजेसाठी करु शकतो. आपल्या दैनंदिन व्यवहारासाठी इंधन हे महत्वाचे आहे. उदा. कोळसा, लाकडे, स्वयपांकाचा गॅस, पेट्रोल, डिझेल, फ्युएल ऑईल आणि रॉकेल या सर्व इंधनात कार्बनचे मोठे प्रमाण असते,
पृथ्वीवर जो कांही कार्बन आहे, त्याचे आपले एक चक्र बनलेले आहे. जेव्हा कार्बन जळतो, तेव्हा तो कार्बन डायऑक्साइड बनतो आणि वातावरणात सामावून जातो. तेथूनच मग वृक्ष आपल्या श्वासाबरोबर त्याला आत घेतात आणि उन्हाच्या मदतीने कार्बन व ऑक्सीजन वेगवेगळे करतात. तो ऑक्सीजन पुन्हा वातावरणात सोडला जातो, आणि आपल्याला श्वासासाठी शुध्द हवा मिळते. कार्बन हा घन पदार्थाच्या रुपाने झाडांची पाने, फुले व बीयांमध्ये राहतो. या सर्व वनस्पतीजन्य गोष्टींना इतर जीवसृष्टी खाते आणि तो कार्बन त्यांच्या शरीराचा एक हिस्सा बनतो. ते प्राणी मेल्यावर त्यांचे र्निजीव शरीर जेव्हां सडेल, गळून पडेल किंवा जळेल तेव्हां त्यातून कार्बन डायऑक्साईड निघून हवेत मिसळेल, मग ते जीव-जन्तु असोत, झाडे-झुडपे असोत किंवा मानव प्राणी असो. किंवा त्यातील कांही कार्बन डायऑक्साइड मातीमध्ये मिळून जातो, आणि खनिजांच्या कार्बोनेटच्या स्वरुपात तेथे राहतो. जेव्हा आपण खनिज पदार्थांपासून धातू निर्माण करतो जसे लोखंड, तांबे, अल्युमिनियम इत्यादी, तेव्हा त्यांच्याबरोबर असलेला कार्बन डायऑक्साइड बाहेर पडून हवेमध्ये परत जातो.
अशाप्रकारे वातावरणातून झाडांमध्ये, तेथून प्राणीमात्रांच्या शरीरामध्ये आणि तेथून कार्बोनेटच्या रुपात मातीमध्ये कार्बन परत येतो. किंवा झाडं किंवा प्राणांचे शरीर सडून गेल्यावर परत कार्बन डायऑक्साइडच्या रुपात वातावरणात मिसळतो. अशाप्रकारे कार्बनचे चक्र चालू रहाते.
सूर्याच्या किरणांनी पृथ्वीवर उष्णता येते. त्यासाठी कार्बन डायऑक्साइड एकप्रकारे दरवाजाचे (संरक्षणाचे) काम करते. सूर्य किरणांपासून मिळणारी उष्णता पृथ्वीच्या आवरणातील अनेक अडथळे पार करुन पृथ्वीपर्यंत येऊन पोहोचते. परंतु हीच उर्जा रात्री अवरक्त किरणांच्या (Infra Red Rays) रुपात पुन्हा पृथ्वीच्या वातारणाच्या बाहेर जाऊ पहात असेल तर कार्बन डायऑक्साइडचा थर तिला मोठ्या प्रमाणांत अडवू शकतो.
ज्या दिवशी वातावरणांत कार्बन डायऑक्साइडची पातळी कमी असेल, तेव्हां तो उष्णतेला बाहेर जाऊ देतो आणि त्यामुळे वातावरणाचे तपमान वाढत नाही. काच पण अशाच प्रकारे दरवाजाचे काम करते. म्हणून तिचा उपयोग ग्रीन हाऊसमध्ये केला जातो. तेथे तो गुण लाभदायक आहे. परंतु जेव्हां कार्बन डायऑक्साइड वातावरणात मोठ्या प्रमाणात वाढतो, तेव्हां जागतिक तपमानात वाढ होते, व त्यामुळे पर्वतावर जमा झालेला बर्फ वितळायला लागतो. त्यामुळे पूर व तुफानासारखी परिस्थिती निर्माण होते.
यावरुन हेही महत्वाचे लक्षांत येते की, पृथ्वीच्या पृष्ठभागाच्या बाहेर जो कार्बन आहे, त्याची कार्बन डायऑक्साइड आणि कार्बन अशी वाटणी आहे, त्या दोन्ही मध्ये संतुलन राहते. कार्बन डायऑक्साइडला वृक्षांनी शोषून घेतले तर वातारणातील तपमानांत वरचेवर वाढ होणार नाही. अशाप्रकारे झाडं-झुडपांच्या सहाय्याने कार्बन चक्राचे संतुलन व्यवस्थित राहते.
मग आता वेळ कशाला दवडायचा ? चला तर आपणही वृक्षारोपण करु या.
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सुंदर नक्षत्र -- मृगशिरा -07
सुंदर नक्षत्र मृगशिरा (हिंदी -- आओ बच्चों -- अलग से)
Published in Lokmat, dt 14 Feb 2009
संक्रांत संपून वसंत ऋतु आलेला आहे, दिवस मोठा होऊ लागलेला आहे. सूर्यास्ताच्या तासाभरानंतर पूर्वेकडे बघितले तर आकाशात सगळयात सुंदर आणि मोठया तारकांनी भरलेले मृगशिरा नक्षत्र आपण लगेच ओळखू शकतो.
आकाशात कधीही चांदण्या बघताना आपल्याला प्रश्न पडतो, की यांची नांवं काय आहेत? कोण कोण आहेत या चांदण्या? आकाशातील सगळयात मोठया चार चांदण्या शुक्र, गुरु, व्याध व अभिजित या आहेत. सध्या सुर्यास्तानंतर पश्चिमेकडे मोठी शुक्राची चांदणी आणि पूर्वेकडे मोठी व्याधाची चांदणी दिसते. त्यांना ओळखायची खूण म्हणजे त्यांचा मोठा आकार होय.
मृगशिरा नक्षत्राला इंग्रजित ‘ओरायन’ असे म्हणतात. हे नक्षत्र आकाशात विस्तीर्ण पसरलेले आहे. याच्या मध्य भागी एक सारख्या चकाकणार्या तीन चांदण्या असतात. त्या एका सरळ रेषेत असतात म्हणून त्यांना त्रिकांड असे म्हणतात. त्यांच्यामुळेच ग्रामिण भागात या नक्षत्राला ‘तीन काडयांचे नक्षत्र’ असे म्हणतात.

चित्रात दाखविल्याप्रमाणे त्रिकांडाच्या सरळ रेषेतच डाव्या बाजूला (दक्षिणेकडे) व्याधाची मोठी चांदणी असते तर उजव्या बाजूला (उत्तरेकडे) रोहीणी नक्षत्राची लालसर चांदणी असते. व्याध, त्रिकांड आणि रोहिणी या पाच चांदण्या जवळपास एका सरळ रेषेत आहेत. यातील व्याधाची चांदणी खूप मोठी असतेच मात्र रोहिणीचा आकारही त्रिकांडाच्या चांदण्यापेक्षा मोठा आहे.
त्रिकांडाच्या थोडया खालच्या बाजूला त्रिकांडाशी सुमारे 30 अंशाचा कोन करीत, एका सरळ रेषेत अजून तीन चांदण्या दिसतात. मात्र या तीन चांदण्यानी आभा कमी-कमी होत गेलेली दिसते.
त्रिकांडांच्या चारी बाजूला साधारणपणे आयाताकृतीमध्ये आणखी चार चांदण्या आहेत, त्या चारही चांदण्याची आभा त्रिकांडातील चांदण्यापेक्षा जास्त परंतु व्याधाची चांदणीपेक्षा कमी व सुमारे रोहीणीच्या चांदणी इतकी असते. या चार आयाताकृती चांदण्यांमुळे मृगशिरा नक्षत्राला ग्रामीण भागात ‘खाटबाजल’ असे नांवही पडलेले आहे. या संपूर्ण विस्तारामुळेच मृग हे आकाशातलं महत्त्वाचं आणि सुंदर नक्षत्र आहे. इतके की सागरी वाहतूकीसाठी दिशा ओळखण्यासाठी सर्व नाविकांना याचा मोठा आधार आहे.
चित्रात दाखविल्याप्रमाणे मृगशिरातील या 10 चांदण्यांच्या थोडे वर समांतर चतुर्भूज आकृतीत पुनर्वसु नक्षत्राच्या चार चांदण्या दिसतात. त्यातील उजवी कडील खालच्या चांदणीची आभा खूप मंद असते. पण हा सुंदर समानान्तर चतुर्भूज ओळखून काढायला पुरेशी असते. या चार चांदण्या मिळून पुनर्वसु नक्षत्र बनते.
मृगशिरा या शब्दाचा अर्थ हरणाचे डोके. भारतीय पौराणिक कथांमध्ये अशी कथा आहे की, एका दृष्ट राक्षसाने रोहीणी नांवाच्या अप्सरेला त्रास देण्यासाठी हरणाचे रुप घेऊन तिच्यावर चाल केली, त्यावेळी विष्णूने व्याध म्हणजेच शिका-याचे रुप धारण करुन तीक्ष्ण बाण सोडला. तो त्या हरणाच्या पोटात रुतला, हे बाण म्हणजे त्रिकांडाच्या तीन चांदण्या आहेत. म्हणून व्याध, त्रिकांड, आणि रोहीणी एका सरळ रेषेत दिसतात. त्रिकांडाच्या खालच्या बाजूस तीन छोटया चांदण्या म्हणजेच हरिणांच्या शरीरातून ओघळलेले रक्ताचे थेंब. त्रिकांडाच्या सभोवताली जे चार आयताकृतीे तारे आहेत ते म्हणजे हरीणीचे शरीर. आयाताकृतीच्या आत इतरही बर्याच छोटया, छोटया चांदण्या आहेत त्या म्हणजे हरीणाच्या शरीरावरील ठिपके. त्या चित्रात दाखविलेल्या नाहीत.
परंतु ग्रीक पौराणिक कथेमध्ये मृगशिराचे नांव ‘ओरायन’ असे आहे. ग्रीक कथेनुसार ओरायन हा एक जबरदस्त शिकारी होता. तो आपल्या कंबरेला तीन हिरे जडवलेला पट्टा बांधत असे, या पट्टयाच्या खालच्या बाजूला त्याचे खंजीर लटकत असे व त्यावरही तीन हिरे जडलेले असत. ओरायनच्या पट्टयातील तीन चमकणारे हिरे म्हणजेच त्रिकांडाच्या तीन चांदण्या होय.ज्या चांदण्याना आपण व्याध म्हणजेच शिकारी असे म्हणतो त्याचे ग्रीक कथेतील नाव ‘सिरीयस’ असे असून तो ओरायनाचा शिकारी कुत्रा होता. खगोल शास्त्रात याला केनिस मेजर असे म्हणतात. या चांदणी जवळच ‘केनिस मायनर’ या नांवाची छोटी चांदणी पण दिसते जी ग्रीक कथेनुसार ओरायनचा छोटा कुत्रा आहे.
आपल्या पृथ्वीच्या सर्वात जवळ जे तीन तारे आहेत ते क्रमश: सुर्य, अल्फा सॅटॉरी व व्याध हे आहेत. यामुळे भविष्यकाळातील अंतरीक्ष विज्ञानासाठी व्याधाची चांदणी महत्वाची आहे.
येत्या महिन्याभरात सुर्यास्तानंतर थोडया वेळात मृगशिरा नक्षत्र, पूर्व दक्षिण क्षितीजावर दिसू लागेल. या नक्षत्राचा रात्रभराचा प्रवास पूर्वेकडून हळू हळू पुढे जात पहाटेच्या सुमारास पार पश्चिम-दक्षिण क्षितीजावर त्याचा अस्त होतो. रात्री वेगवेगळया वेळी अधून मधुन उठून आकाशाकडे दृष्टी टाकली तर या सुंदर नक्षत्राची आपल्याला ओळख पटेल व ते आकाशात कसे फिरत आहे ते आपल्याला कळेल. इतर नक्षत्रांबाबत शिकतांना मृग नक्षत्राची ओळख खूप उपयोगी ठरते.
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Published in Lokmat, dt 14 Feb 2009
संक्रांत संपून वसंत ऋतु आलेला आहे, दिवस मोठा होऊ लागलेला आहे. सूर्यास्ताच्या तासाभरानंतर पूर्वेकडे बघितले तर आकाशात सगळयात सुंदर आणि मोठया तारकांनी भरलेले मृगशिरा नक्षत्र आपण लगेच ओळखू शकतो.
आकाशात कधीही चांदण्या बघताना आपल्याला प्रश्न पडतो, की यांची नांवं काय आहेत? कोण कोण आहेत या चांदण्या? आकाशातील सगळयात मोठया चार चांदण्या शुक्र, गुरु, व्याध व अभिजित या आहेत. सध्या सुर्यास्तानंतर पश्चिमेकडे मोठी शुक्राची चांदणी आणि पूर्वेकडे मोठी व्याधाची चांदणी दिसते. त्यांना ओळखायची खूण म्हणजे त्यांचा मोठा आकार होय.
मृगशिरा नक्षत्राला इंग्रजित ‘ओरायन’ असे म्हणतात. हे नक्षत्र आकाशात विस्तीर्ण पसरलेले आहे. याच्या मध्य भागी एक सारख्या चकाकणार्या तीन चांदण्या असतात. त्या एका सरळ रेषेत असतात म्हणून त्यांना त्रिकांड असे म्हणतात. त्यांच्यामुळेच ग्रामिण भागात या नक्षत्राला ‘तीन काडयांचे नक्षत्र’ असे म्हणतात.

चित्रात दाखविल्याप्रमाणे त्रिकांडाच्या सरळ रेषेतच डाव्या बाजूला (दक्षिणेकडे) व्याधाची मोठी चांदणी असते तर उजव्या बाजूला (उत्तरेकडे) रोहीणी नक्षत्राची लालसर चांदणी असते. व्याध, त्रिकांड आणि रोहिणी या पाच चांदण्या जवळपास एका सरळ रेषेत आहेत. यातील व्याधाची चांदणी खूप मोठी असतेच मात्र रोहिणीचा आकारही त्रिकांडाच्या चांदण्यापेक्षा मोठा आहे.
त्रिकांडाच्या थोडया खालच्या बाजूला त्रिकांडाशी सुमारे 30 अंशाचा कोन करीत, एका सरळ रेषेत अजून तीन चांदण्या दिसतात. मात्र या तीन चांदण्यानी आभा कमी-कमी होत गेलेली दिसते.
त्रिकांडांच्या चारी बाजूला साधारणपणे आयाताकृतीमध्ये आणखी चार चांदण्या आहेत, त्या चारही चांदण्याची आभा त्रिकांडातील चांदण्यापेक्षा जास्त परंतु व्याधाची चांदणीपेक्षा कमी व सुमारे रोहीणीच्या चांदणी इतकी असते. या चार आयाताकृती चांदण्यांमुळे मृगशिरा नक्षत्राला ग्रामीण भागात ‘खाटबाजल’ असे नांवही पडलेले आहे. या संपूर्ण विस्तारामुळेच मृग हे आकाशातलं महत्त्वाचं आणि सुंदर नक्षत्र आहे. इतके की सागरी वाहतूकीसाठी दिशा ओळखण्यासाठी सर्व नाविकांना याचा मोठा आधार आहे.
चित्रात दाखविल्याप्रमाणे मृगशिरातील या 10 चांदण्यांच्या थोडे वर समांतर चतुर्भूज आकृतीत पुनर्वसु नक्षत्राच्या चार चांदण्या दिसतात. त्यातील उजवी कडील खालच्या चांदणीची आभा खूप मंद असते. पण हा सुंदर समानान्तर चतुर्भूज ओळखून काढायला पुरेशी असते. या चार चांदण्या मिळून पुनर्वसु नक्षत्र बनते.
मृगशिरा या शब्दाचा अर्थ हरणाचे डोके. भारतीय पौराणिक कथांमध्ये अशी कथा आहे की, एका दृष्ट राक्षसाने रोहीणी नांवाच्या अप्सरेला त्रास देण्यासाठी हरणाचे रुप घेऊन तिच्यावर चाल केली, त्यावेळी विष्णूने व्याध म्हणजेच शिका-याचे रुप धारण करुन तीक्ष्ण बाण सोडला. तो त्या हरणाच्या पोटात रुतला, हे बाण म्हणजे त्रिकांडाच्या तीन चांदण्या आहेत. म्हणून व्याध, त्रिकांड, आणि रोहीणी एका सरळ रेषेत दिसतात. त्रिकांडाच्या खालच्या बाजूस तीन छोटया चांदण्या म्हणजेच हरिणांच्या शरीरातून ओघळलेले रक्ताचे थेंब. त्रिकांडाच्या सभोवताली जे चार आयताकृतीे तारे आहेत ते म्हणजे हरीणीचे शरीर. आयाताकृतीच्या आत इतरही बर्याच छोटया, छोटया चांदण्या आहेत त्या म्हणजे हरीणाच्या शरीरावरील ठिपके. त्या चित्रात दाखविलेल्या नाहीत.
परंतु ग्रीक पौराणिक कथेमध्ये मृगशिराचे नांव ‘ओरायन’ असे आहे. ग्रीक कथेनुसार ओरायन हा एक जबरदस्त शिकारी होता. तो आपल्या कंबरेला तीन हिरे जडवलेला पट्टा बांधत असे, या पट्टयाच्या खालच्या बाजूला त्याचे खंजीर लटकत असे व त्यावरही तीन हिरे जडलेले असत. ओरायनच्या पट्टयातील तीन चमकणारे हिरे म्हणजेच त्रिकांडाच्या तीन चांदण्या होय.ज्या चांदण्याना आपण व्याध म्हणजेच शिकारी असे म्हणतो त्याचे ग्रीक कथेतील नाव ‘सिरीयस’ असे असून तो ओरायनाचा शिकारी कुत्रा होता. खगोल शास्त्रात याला केनिस मेजर असे म्हणतात. या चांदणी जवळच ‘केनिस मायनर’ या नांवाची छोटी चांदणी पण दिसते जी ग्रीक कथेनुसार ओरायनचा छोटा कुत्रा आहे.
आपल्या पृथ्वीच्या सर्वात जवळ जे तीन तारे आहेत ते क्रमश: सुर्य, अल्फा सॅटॉरी व व्याध हे आहेत. यामुळे भविष्यकाळातील अंतरीक्ष विज्ञानासाठी व्याधाची चांदणी महत्वाची आहे.
येत्या महिन्याभरात सुर्यास्तानंतर थोडया वेळात मृगशिरा नक्षत्र, पूर्व दक्षिण क्षितीजावर दिसू लागेल. या नक्षत्राचा रात्रभराचा प्रवास पूर्वेकडून हळू हळू पुढे जात पहाटेच्या सुमारास पार पश्चिम-दक्षिण क्षितीजावर त्याचा अस्त होतो. रात्री वेगवेगळया वेळी अधून मधुन उठून आकाशाकडे दृष्टी टाकली तर या सुंदर नक्षत्राची आपल्याला ओळख पटेल व ते आकाशात कसे फिरत आहे ते आपल्याला कळेल. इतर नक्षत्रांबाबत शिकतांना मृग नक्षत्राची ओळख खूप उपयोगी ठरते.
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