मंगलवार, 16 जून 2015
शनिवार, 14 मार्च 2015
बुधवार, 21 जनवरी 2015
उपसर्ग -‘आ' व्याकरण की मजेदार बातें
व्याकरण की मजेदार बातें
उपसर्ग -‘आ'
मित्रों, हम भारतीय भाषाओं की एक सुंदर खूबी को समझ रहे थे जिसका नाम है उपसर्ग। ये उपसर्ग किन्हीं शब्दों को साथ लगकर उन्हें विशेष अर्थ प्रदान करते हैं। साथ ही उनके इस गुण के कारण हम कम ही शब्दों में कोई गुण या कोई वर्णन पूरा कर सकते हैं।
एक उपसर्ग है ‘आ’ जिसे मैं जादूगर उपसर्ग कहती हूँ क्यों कि इसके उपयोग से हम लम्बी बात को छोटे या कम शब्दों मे कह सकते हैं। ‘आ’ उपसर्ग से “तक” का अर्थबोध होता है। अब देखो कुछ शब्द जो ‘आ’ से बने हैं।
आजीवन या आजन्म - जब तक जीवन है या जन्म है तबतक
जैसे- वे आजीवन बच्चों को पढ़ाते रहे।
गांधीजी ने आजीवन चरखा चलाने का व्रत लिया।
जिस प्रकार आ जीवन के साथ लग गया, उसी प्रकार वह मरण के साथ भी लग सकता है।
आमरण- जब तक मरण नही आ जाता तब तक-
अण्णा आमरण उपोषण पर बैठ गये।
आ के प्रयोग से कितना लम्बा वर्णन सिमटा जा सकता है इसे हम निम्न शब्दों से समझ सकते हैं-
आजानुबाहू- वह व्यक्ति जिसके हाथ सामान्यसे लम्बे होने के कारण उसके घुटनों तक पहुँचते हैं।
अब मजे की बात कि हर व्यक्ति आजानुबाहू नही होता । केवल हजारों- लाखोंमे कोई एक आजानुबाहू होता है। लेकिन श्रीराम आजानुबाहू थे। इसलिए यदि आजानुबाहू शब्द बहुब्रीहि समास के अर्थ में प्रयुक्त होता है तब वह श्रीराम की ओर इंगित करता है।
आपादमस्तक- सिर से पांव तक- खासकर ऐसे वाक्यों में कि दादी ने मुझे “आपादमस्तक” देखा- अर्थात् मन ही मन मुझे तौलने के अर्थ में भी।
आसेतुहिमाचल- यह भारत के भूगोल को बताता है कि भारत देश हिमालय पर्वत से लेकर ‘सेतु’ तक फैला हुआ है। यहाँ “सेतु” से तात्पर्य है वह रामसेतु जो श्रीराम ने लंका जाने के लिये समुद्र पर बनाया था। अर्थात् हिमालयकी उँचाईसे लेकर रामेश्वर के छोर तक।
आसमुद्र- समुद्र तक
आकर्ण- कानों तक (धनुष्य को आकर्ण खींचा)
मित्रों, तुम भी आ उपसर्ग के अन्य शब्द खोजो तब तक मैं व्याकरण की अगली मजेदार बात लिखकर भेजती हूँ।
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उपसर्ग -‘आ'
मित्रों, हम भारतीय भाषाओं की एक सुंदर खूबी को समझ रहे थे जिसका नाम है उपसर्ग। ये उपसर्ग किन्हीं शब्दों को साथ लगकर उन्हें विशेष अर्थ प्रदान करते हैं। साथ ही उनके इस गुण के कारण हम कम ही शब्दों में कोई गुण या कोई वर्णन पूरा कर सकते हैं।
एक उपसर्ग है ‘आ’ जिसे मैं जादूगर उपसर्ग कहती हूँ क्यों कि इसके उपयोग से हम लम्बी बात को छोटे या कम शब्दों मे कह सकते हैं। ‘आ’ उपसर्ग से “तक” का अर्थबोध होता है। अब देखो कुछ शब्द जो ‘आ’ से बने हैं।
आजीवन या आजन्म - जब तक जीवन है या जन्म है तबतक
जैसे- वे आजीवन बच्चों को पढ़ाते रहे।
गांधीजी ने आजीवन चरखा चलाने का व्रत लिया।
जिस प्रकार आ जीवन के साथ लग गया, उसी प्रकार वह मरण के साथ भी लग सकता है।
आमरण- जब तक मरण नही आ जाता तब तक-
अण्णा आमरण उपोषण पर बैठ गये।
आ के प्रयोग से कितना लम्बा वर्णन सिमटा जा सकता है इसे हम निम्न शब्दों से समझ सकते हैं-
आजानुबाहू- वह व्यक्ति जिसके हाथ सामान्यसे लम्बे होने के कारण उसके घुटनों तक पहुँचते हैं।
अब मजे की बात कि हर व्यक्ति आजानुबाहू नही होता । केवल हजारों- लाखोंमे कोई एक आजानुबाहू होता है। लेकिन श्रीराम आजानुबाहू थे। इसलिए यदि आजानुबाहू शब्द बहुब्रीहि समास के अर्थ में प्रयुक्त होता है तब वह श्रीराम की ओर इंगित करता है।
आपादमस्तक- सिर से पांव तक- खासकर ऐसे वाक्यों में कि दादी ने मुझे “आपादमस्तक” देखा- अर्थात् मन ही मन मुझे तौलने के अर्थ में भी।
आसेतुहिमाचल- यह भारत के भूगोल को बताता है कि भारत देश हिमालय पर्वत से लेकर ‘सेतु’ तक फैला हुआ है। यहाँ “सेतु” से तात्पर्य है वह रामसेतु जो श्रीराम ने लंका जाने के लिये समुद्र पर बनाया था। अर्थात् हिमालयकी उँचाईसे लेकर रामेश्वर के छोर तक।
आसमुद्र- समुद्र तक
आकर्ण- कानों तक (धनुष्य को आकर्ण खींचा)
मित्रों, तुम भी आ उपसर्ग के अन्य शब्द खोजो तब तक मैं व्याकरण की अगली मजेदार बात लिखकर भेजती हूँ।
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शनिवार, 29 नवंबर 2014
***व्याकरणकी मजेदार बातें -11 -उपसर्ग(1) देवपुत्र अक्तूबर 2014
व्याकरणकी मजेदार बातें -11 -उपसर्ग (1)
देवपुत्र, इंदौर, अक्तूबर 2014
देवपुत्र, इंदौर, अक्तूबर 2014
व्याकरण की बाते
उपसर्ग
मित्रों, हमारी सारी भारतीय भाषाएँ संस्कृत से उभरी हैं, और संस्कृत की विशेषताएँ लेकर उभरी हैं। संस्कृत में शब्दों का सामर्थ्य बढाने हेतु कई युक्तियाँ हैं। संधि और समास ऐसी दो युक्तियाँ थी और हमने बहुब्रीही समासको विस्तार से समझा। ऐसी ही अन्य युक्ती है कि शब्दों के पहले उपसर्ग लगाकर उन्हे विशेष अर्थ दिया जाता है। मुझे स्कूल में व्याकरण का यह पाठ भी बहुत अच्छा लगता था और व्याकरण की पुस्तक से सूची बनाकर मैंने उन्हें रट लिया था- प्र, परा , अप, सम, अनु, अव, निस, निर, दुस , दुर, वि, आ, नि । वैसे और भी उपसर्ग हैं पर ये प्रमुख हैं ।
अब उपसर्ग का काम क्या है? तो उपसर्ग किसी शब्द के पीछे लग कर उसे दूसरा विशेष अर्थ प्रदान करता है। और प्रत्येक उपसर्ग का अपना अपना अर्थ होता है- वही उस शब्द के साथ जुड जाता है। इसके कुछ उदाहरण देखने हैं- एक उपसर्ग है ‘अ’ जो किसी शब्द के साथ लगने पर उसे उलटा अर्थ देता है। जैसे-
पात्र- सही व्यक्ति.
अपात्र- वह व्यक्ति जो सही नही है (उस काम के लिये).
संभव- जो हो सकता है.
असंभव- जो नही हो सकता.
मर्त्य- जो मर जाता है.
अमर्त्य- जो मर नही सकता.
दूसरा एक उपसर्ग है ‘स’ जो साथ-साथ होने के अर्थ में प्रयुक्त होता है।
जैसे कारण- सकारण,
आकार- साकार
फल- सफल
शब्द- सशब्द
s
जब ‘सु’ उपसर्ग लगता है तब गुणों में वृद्धि का बोध देता है.
जैसे- गंध- सुगंध
कोमल- सुकोमल
आगत- सुआगत = स्वागत
शोभित - सुशोभित
जब ‘प्र’ उपसर्ग लगता है तब प्रचंडता, पराक्रम, मेहनत का बोध देता है । इन शब्दों का स्मरण करो, और हरेक के अर्थ पर गौर करो-
प्रभु, प्ररवर, प्रकाण्ड, प्रफुल्ल, प्रस्फुटित, प्रचण्ड, प्रसार, प्रकार, प्रभास, प्रसन्न आदि।
हिंदी का शब्दकोष देखो तो प्र उपसर्ग से आरंभ होनेवाले सौ से अधिक शब्द तुम्हें मिलेंगे और प्रत्येक का अर्थ समझ लेने से तुम्हारे शब्द सामर्थ्य में, शब्द-प्रभुता में प्रचण्ड वृद्धि होगी ।
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***व्याकरणकी मजेदार बातें -12 -उपसर्ग(2) नोव्हेंबर 2014
व्याकरणकी मजेदार बातें -12 -उपसर्ग
देवपुत्र, इंदौर, नोव्हेंबर 2014
उपसर्ग के अर्थ जानो
बच्चों, हमने पिछले अंक में देखा की शब्दों के पिछे उपसर्ग लगाकर उन्हें विशेष अर्थ दिया जा सकता है। इसी कडी को थोडा और समझते हैं।
अ और निर ये दो उपसर्ग ऐसे हैं- जिनका सामान्य अर्थ अभाव होता है। लेकिन ऐसा नही कि जहाँ चाहो अ की जगह निर लगा दिया। दोनों के कुछ खास शब्दों का गौर करो-
अनादि, अमर, अज्ञान, अपात्र इत्यादि में अ की जगह निर नही लगा सकते। निर्विवाद, निर्मनुष्य, निर्मम, में निर की जगह अ नही लगा सकते।
एक और उपसर्ग है निः या निस्। प्रायः संधि बनाने के लिये निः का विसर्ग स में बदल जाता है।
निस्संग, निश्चल, निस्तार, आदि में निस् उपसर्ग का उपयोग होता है- निर् का नही होता।
अब इन शब्दों की तुलना करो-
अभय- निर्भय
अचल- निश्चल
यहाँ अभय और निर्भय दोनों शब्दों के अर्थ में अन्तर है। इसी प्रकार अचल और निश्चल मे भी अंतर है। इस सूक्ष्म भेद को मैंने ऐसे समझा कि जहाँ मूलतः ही अभाव हो, वहा अ का प्रयोग होता है परन्तु जहाँ संभावना होते हुए भी प्रयत्न पूर्वक उसका निस्तार किया जाता है वहाँ निस या निर उपसर्ग लगाया जाता है।
अब हम कई उपसर्ग लेकर उनके पांच पांच शब्द सीखेंगे। और शर्त यह है कि अगला अंक देखने से पहले तुम में से कौन कौन मुझे किस किस उपसर्ग के पांच-पांच शब्द भेज सकता है, जरा मैं भी तो देखूँ। परा उपसर्ग के पांच शब्द- पराजय, परावलम्बी, परामर्श, पराकाष्टा, परांचन.
सम उपसर्ग के पांच शब्द- समन्वय, समष्टि, समकालीन, सम्पूर्ण, समग्र.
अनु उपसर्ग के पांच शब्द- अनुबंध, अनुपालन, अनुशंसा, अनुज, अनुभूति- अनुकरण.
यहाँ अनु शब्द का अर्थ है छोटा या सीमित। लेकिन अनु के शब्दों में अनुदार मत लिख देना क्यों कि वहाँ लगा हुआ उपसर्ग अन् + उदार = अनुदार है।
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व्याकरणकी मजेदार बातें -12 -उपसर्ग नोव्हेंबर 2014
मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014
पिंडारी -काफनी ग्लेशियर्स -- एक थरारक ट्रेक -हृषीकेश 25 जून 1995
पिंडारी -काफनी ग्लेशियर्स -- एक थरारक ट्रेक
हृषीकेश --
उन्हाळ्याच्या सुटीत आम्ही मुले मोकळी असतो. शाळेची कटकट नसते. सुटीतल्या ट्युशन्स नसतील तर तीही कटकट नसते. उलट आपल्यापैकी काहींना सुटीत “वेळ कसा घालवावा” हीच काळजी पडलेली असते.
यासाठी म्हणजे वेळ घालवायला व निसर्गाचे खरे सौंदर्य बघायला ट्रेकींग (गिर्यारोहण) हे एक स्वाभाविक उत्तर. ट्रेकींगमध्ये डोंगराच्या मोकळ्या हवेत चालणे होते, आंरामात गप्पा मारत, मजेत वेळही जातो व खऱ्या निसर्गसौंदर्याची जाणीवसुध्दा होते. यात धाडस अर्थातच असते.
ट्रेकिंग ग्रुप खूप असतात. हे ग्रुप सर्व ट्रेकींगची व्यवस्था करतात. अशा ट्रेकवर आपला मित्रपरिवारही वाढतो. आपण इतर खुप लोकांनाही भेटू शकतो.
पुण्यात एक “युवाशक्ती” नामक ट्रेकींगचा ग्रुप आहे. हे लोक ट्रेकचे आयोजन करतात. यापैकी सारखे होणारे ट्रेक म्हणजे महाबळेश्वर, कात्रज, सिंहगड इत्यादी. युवाशक्तीतर्फे हिमालयातसुध्दा खुप ट्रेक होतात. ते म्हणजे मनाली, रोहतांग पास (हिमाचल), नैनिताल, पिंडारी, काफनी (कुमाऊँ), Valley of Flowers (उत्तर प्रदेश) व एव्हरेस्ट बेस कॅम्प (नेताळ) पुढच्या वर्षी युवाशक्तीतर्फे मसुरीलासुध्दा ट्रेक होणार आहेत.
त्यांच्याचबरोबर या वर्षी मी PK म्हणजे पिंडारी- काफनीचा ट्रेक करुन आलो. असे ट्रेक१४ / १५ दिवसांचे असतात. पुणे स्टेशनवरून झेलम एक्सप्रेसने दिल्लीपर्यंत मनाली, पिंडारी- काफनी व व्हॅली ऑफ फ्लॉवर्सच्या बॅचेस जातात. तिथून पुढे हिमाचल टुरिझमच्या बसने मनाली व प्रायव्हेट टुरिस्ट बसने PK व V.O.F. च्या बॅचेस जातात.
बेस कॅम्पपासून पिंडारी ग्लेशियर्सपर्यंत डोंगरातून ट्रेकींग करावे लागते, डोंगरातून व बर्फातून चालावे लागते.
आमच्या ३० जाणांचा मुला-मुलींचा ग्रुप पुण्याहून झेलम एक्सप्रेसने निघाला. या ग्रुपमध्ये साधारणतः १२ ते ५० या गटातील लोकांना घेतात. पण ह्या वयोमानाकडे कोणी लक्ष देत नाही. आताच्या बॅचमध्ये एक ४ वर्षाचा मुलगा आला होता. जेव्हा मी मनालीला गेलो तेव्हा तर एक ८३ वर्षाचे “आजोबा” आले होते. ते सर्वांबरोबरच चालायचे. असे जेव्हा होते तेव्हा तर वयोगट “४ ते ८३ कोणीही” असे आपण म्हणू शकतो.
आम्ही २१ तारखेला रात्री १०.३० वाजता दिल्ली स्टेशनवर पोहोचलो. रात्री “सुविधा डिलक्स” नावाच्या हॉटेलमध्ये उतरलो. हे दिल्ली स्टेशनवरुन ५ मिनिटांच्या चालायच्या अंतरावर आहे. पुढच्या दिवशी प्रायव्हेट टुरिस्ट बसमधून आम्ही नैनितालला गेलो. तेव्हा तर नैनिताल बघायला आम्हाला वेळ मिळाला नाही. रात्री उशिरा पोहोचलो व सकाळी लवकर बागेश्वर करता निघालो.
नैनितालला आम्ही KMVN म्हणजे “कुमाऊँ मंडल विकास निगम” च्या गेस्टहाऊसमध्ये थांबलो होतो. खोलीच्या खिडक्यांमधून नैनिताल लेकचे उत्तम दर्शन होत होते.
आम्ही बागेश्वरला संध्याकाळी ४ वाजता पोहोचलो. तिथला कुमाऊँ टुरिस्ट बंगला म्हणजेच आमचा बेस कॅम्प. कॅम्पला आम्हाला रकसॅक मिळाल्या. माझी स्वतःची सॅक असल्याने मी ती रकसॅक घेतली नाही. प्रत्येक कॅम्पवर आम्हाला स्लिपींग बॅग मिळाल्या.
कुठल्याही अशा ट्रेकवर पाठीवरचे ओझं सगळीकडे वाहायला लागते. म्हणून कमीत कमी ओझं पाठीवर असावे. यासाठी प्रत्येक कॅम्पवर आम्ही कुमाऊँच्या कॅम्पमध्ये राहिलो व तिथल्याच स्लिपींग बॅग वापरल्या. तिथले जेवण आपल्यासारखेच असायचे.
बागेश्वरपासून सोंगपर्यंत आम्ही बसने गेलो होतो. सोंगपासून खरा ट्रेक सुरु झाला.सोंगवरून आम्ही पहिल्या दिवशी ५ कि. मी. चाललो. जेवण, आख्खी संध्याकाळ व रात्र आम्ही इथेच काढली. या दिवशी आम्ही सर्वांनी पूर्ण धमाल केली. रात्री कॅम्पफायर केली. दुस-या दिवशी धाकूडीला जेवायला थांबून आम्ही खातीला गेलो. (या भागात अशीच विचित्र नावं असतात) धाकूही कॅम्पवरून नंदा कोटचे शिखर दिसते. खाती कॅम्पवरून आम्ही व्दालीमार्गे रात्री फुर्कियाला थांबलो. चौथ्या दिवशी आम्ही पिंडारी ग्लेशियरला गेलो. हा जाऊन- येऊन १४ कि. मी. चा ट्रेक आहे. पण बर्फाळलेल्या वातावरणामुळे आम्ही “झीरो पॉईंटपर्यंत” जाऊ शकलो नाही. ग्लेशियरच्या सुरुवातीलाच थांबावे लागले. पिंडारीचे खरे सौंदर्य आम्हाला दिसू शकले नाही. तरीसुध्दा इथे खुप मजा आली. जेवायला फुर्कियाला परत येऊन पुढे व्दालीपर्यंत गेलो. काफनीचा ट्रेक सर्वात लांब व कठीण होता. २६ कि.मी. आम्हाला जाऊन- येऊन चालावे लागले. हे आम्ही ११ तासात संपवले. मग त्यानंतर परत आलो. व्दाली व बागेश्वर बेस कॅम्प सोडून एकही कॅम्प रिपीट झाला नाही.
आमचा ३० जणांचा ग्रुप पुण्याहून झेलम एक्सप्रेसनी २० तारखेला निघाला. त्यानंतर
वरच्याप्रमाणे आमचे हिंडणे झाले. रोजचे साधारण १५ किलोमिटर चालूनसुध्दा आम्ही कोणी थकलो नाही. फक्त काफनीला जायच्या दिवशी २६ कि. मी. ११ तासात (फक्त!) पार केले. काफनीवर होणारी “Avalanche” आमच्या ग्रुपला प्रत्यक्ष बघायला मिळाली. आम्ही सगळे दूरुन बघत होतो. माझ्यासह खुपजणांनी फोटोही घेतले. टिंगल- टवाळी तर रोजच चालायच्या. पिंडारीवर जेव्हा आमच्या ग्रुप लिडर सरांनी सगळ्यांच्या शर्टात बर्फ टाकला तेव्हा पुढच्या दिवशी काफनी ग्लेशियरवर सर्वांनी त्यांच्यावर बर्फाचे गोळे फेकले. दोन- दोन, तीन- तीनच्या ग्रुपमध्ये चालत - चालत, गप्पा मारत वेळ कसा जायचा हेच समजायचे नाही. आठ कि. मी. चढ मी एकबरोबर गप्पा मारत साडे तीन तासात संपवला. एकटा गेलो असतो तर? ते सुध्दा दाट झाडीमधून खुप डास- माश्या तर होत्याच, “ओनीडा” (सरडे) सुध्दा होते. एकदातर एक ५/६ सरड्यांचा घोळका बघितला, पण फोटो काढायच्या आधीच ते पळून गेले. शेवटच्या दिवशी सगळ्यांना “इतक्या लवकर ट्रेक संपला?” असे वाटायला लागले. पुण्याहून जातांना आम्ही ट्रेनमध्ये मजा केली, गाणी, भेंड्या इ. खेळलो.
अशा रितीने आमचा १६ दिवसांचा ट्रेक संपला. कोणाला ट्रेकिंगला जाण्याची इच्छा असेल अथवा ‘युवाशक्ती’ ची शाखा नाशिकमध्ये उघडायची असेल तर युवाशक्ती (पुणे) यांची मदत होऊ शकेल.
त्यांचा पत्ता- युवाशक्ती,
३८८, नारायण पेठ,
राष्ट्रभाषा भवन, पुणे-३०,
(४११०३०), दूरध्वनी- ४५६६९६
असा आहे.
युवाशक्तीच्या औरंगाबाद व मुंबई येथेही शाखाआहेत.
हृषीकेश मेहंदळे,
राजगृह, विभागीय
आयुक्त निवास,
गोल्फक्लब रोड, नाशिक.
हृषीकेश --
उन्हाळ्याच्या सुटीत आम्ही मुले मोकळी असतो. शाळेची कटकट नसते. सुटीतल्या ट्युशन्स नसतील तर तीही कटकट नसते. उलट आपल्यापैकी काहींना सुटीत “वेळ कसा घालवावा” हीच काळजी पडलेली असते.
यासाठी म्हणजे वेळ घालवायला व निसर्गाचे खरे सौंदर्य बघायला ट्रेकींग (गिर्यारोहण) हे एक स्वाभाविक उत्तर. ट्रेकींगमध्ये डोंगराच्या मोकळ्या हवेत चालणे होते, आंरामात गप्पा मारत, मजेत वेळही जातो व खऱ्या निसर्गसौंदर्याची जाणीवसुध्दा होते. यात धाडस अर्थातच असते.
ट्रेकिंग ग्रुप खूप असतात. हे ग्रुप सर्व ट्रेकींगची व्यवस्था करतात. अशा ट्रेकवर आपला मित्रपरिवारही वाढतो. आपण इतर खुप लोकांनाही भेटू शकतो.
पुण्यात एक “युवाशक्ती” नामक ट्रेकींगचा ग्रुप आहे. हे लोक ट्रेकचे आयोजन करतात. यापैकी सारखे होणारे ट्रेक म्हणजे महाबळेश्वर, कात्रज, सिंहगड इत्यादी. युवाशक्तीतर्फे हिमालयातसुध्दा खुप ट्रेक होतात. ते म्हणजे मनाली, रोहतांग पास (हिमाचल), नैनिताल, पिंडारी, काफनी (कुमाऊँ), Valley of Flowers (उत्तर प्रदेश) व एव्हरेस्ट बेस कॅम्प (नेताळ) पुढच्या वर्षी युवाशक्तीतर्फे मसुरीलासुध्दा ट्रेक होणार आहेत.
त्यांच्याचबरोबर या वर्षी मी PK म्हणजे पिंडारी- काफनीचा ट्रेक करुन आलो. असे ट्रेक१४ / १५ दिवसांचे असतात. पुणे स्टेशनवरून झेलम एक्सप्रेसने दिल्लीपर्यंत मनाली, पिंडारी- काफनी व व्हॅली ऑफ फ्लॉवर्सच्या बॅचेस जातात. तिथून पुढे हिमाचल टुरिझमच्या बसने मनाली व प्रायव्हेट टुरिस्ट बसने PK व V.O.F. च्या बॅचेस जातात.
बेस कॅम्पपासून पिंडारी ग्लेशियर्सपर्यंत डोंगरातून ट्रेकींग करावे लागते, डोंगरातून व बर्फातून चालावे लागते.
आमच्या ३० जाणांचा मुला-मुलींचा ग्रुप पुण्याहून झेलम एक्सप्रेसने निघाला. या ग्रुपमध्ये साधारणतः १२ ते ५० या गटातील लोकांना घेतात. पण ह्या वयोमानाकडे कोणी लक्ष देत नाही. आताच्या बॅचमध्ये एक ४ वर्षाचा मुलगा आला होता. जेव्हा मी मनालीला गेलो तेव्हा तर एक ८३ वर्षाचे “आजोबा” आले होते. ते सर्वांबरोबरच चालायचे. असे जेव्हा होते तेव्हा तर वयोगट “४ ते ८३ कोणीही” असे आपण म्हणू शकतो.
आम्ही २१ तारखेला रात्री १०.३० वाजता दिल्ली स्टेशनवर पोहोचलो. रात्री “सुविधा डिलक्स” नावाच्या हॉटेलमध्ये उतरलो. हे दिल्ली स्टेशनवरुन ५ मिनिटांच्या चालायच्या अंतरावर आहे. पुढच्या दिवशी प्रायव्हेट टुरिस्ट बसमधून आम्ही नैनितालला गेलो. तेव्हा तर नैनिताल बघायला आम्हाला वेळ मिळाला नाही. रात्री उशिरा पोहोचलो व सकाळी लवकर बागेश्वर करता निघालो.
नैनितालला आम्ही KMVN म्हणजे “कुमाऊँ मंडल विकास निगम” च्या गेस्टहाऊसमध्ये थांबलो होतो. खोलीच्या खिडक्यांमधून नैनिताल लेकचे उत्तम दर्शन होत होते.
आम्ही बागेश्वरला संध्याकाळी ४ वाजता पोहोचलो. तिथला कुमाऊँ टुरिस्ट बंगला म्हणजेच आमचा बेस कॅम्प. कॅम्पला आम्हाला रकसॅक मिळाल्या. माझी स्वतःची सॅक असल्याने मी ती रकसॅक घेतली नाही. प्रत्येक कॅम्पवर आम्हाला स्लिपींग बॅग मिळाल्या.
कुठल्याही अशा ट्रेकवर पाठीवरचे ओझं सगळीकडे वाहायला लागते. म्हणून कमीत कमी ओझं पाठीवर असावे. यासाठी प्रत्येक कॅम्पवर आम्ही कुमाऊँच्या कॅम्पमध्ये राहिलो व तिथल्याच स्लिपींग बॅग वापरल्या. तिथले जेवण आपल्यासारखेच असायचे.
बागेश्वरपासून सोंगपर्यंत आम्ही बसने गेलो होतो. सोंगपासून खरा ट्रेक सुरु झाला.सोंगवरून आम्ही पहिल्या दिवशी ५ कि. मी. चाललो. जेवण, आख्खी संध्याकाळ व रात्र आम्ही इथेच काढली. या दिवशी आम्ही सर्वांनी पूर्ण धमाल केली. रात्री कॅम्पफायर केली. दुस-या दिवशी धाकूडीला जेवायला थांबून आम्ही खातीला गेलो. (या भागात अशीच विचित्र नावं असतात) धाकूही कॅम्पवरून नंदा कोटचे शिखर दिसते. खाती कॅम्पवरून आम्ही व्दालीमार्गे रात्री फुर्कियाला थांबलो. चौथ्या दिवशी आम्ही पिंडारी ग्लेशियरला गेलो. हा जाऊन- येऊन १४ कि. मी. चा ट्रेक आहे. पण बर्फाळलेल्या वातावरणामुळे आम्ही “झीरो पॉईंटपर्यंत” जाऊ शकलो नाही. ग्लेशियरच्या सुरुवातीलाच थांबावे लागले. पिंडारीचे खरे सौंदर्य आम्हाला दिसू शकले नाही. तरीसुध्दा इथे खुप मजा आली. जेवायला फुर्कियाला परत येऊन पुढे व्दालीपर्यंत गेलो. काफनीचा ट्रेक सर्वात लांब व कठीण होता. २६ कि.मी. आम्हाला जाऊन- येऊन चालावे लागले. हे आम्ही ११ तासात संपवले. मग त्यानंतर परत आलो. व्दाली व बागेश्वर बेस कॅम्प सोडून एकही कॅम्प रिपीट झाला नाही.
आमचा ३० जणांचा ग्रुप पुण्याहून झेलम एक्सप्रेसनी २० तारखेला निघाला. त्यानंतर
वरच्याप्रमाणे आमचे हिंडणे झाले. रोजचे साधारण १५ किलोमिटर चालूनसुध्दा आम्ही कोणी थकलो नाही. फक्त काफनीला जायच्या दिवशी २६ कि. मी. ११ तासात (फक्त!) पार केले. काफनीवर होणारी “Avalanche” आमच्या ग्रुपला प्रत्यक्ष बघायला मिळाली. आम्ही सगळे दूरुन बघत होतो. माझ्यासह खुपजणांनी फोटोही घेतले. टिंगल- टवाळी तर रोजच चालायच्या. पिंडारीवर जेव्हा आमच्या ग्रुप लिडर सरांनी सगळ्यांच्या शर्टात बर्फ टाकला तेव्हा पुढच्या दिवशी काफनी ग्लेशियरवर सर्वांनी त्यांच्यावर बर्फाचे गोळे फेकले. दोन- दोन, तीन- तीनच्या ग्रुपमध्ये चालत - चालत, गप्पा मारत वेळ कसा जायचा हेच समजायचे नाही. आठ कि. मी. चढ मी एकबरोबर गप्पा मारत साडे तीन तासात संपवला. एकटा गेलो असतो तर? ते सुध्दा दाट झाडीमधून खुप डास- माश्या तर होत्याच, “ओनीडा” (सरडे) सुध्दा होते. एकदातर एक ५/६ सरड्यांचा घोळका बघितला, पण फोटो काढायच्या आधीच ते पळून गेले. शेवटच्या दिवशी सगळ्यांना “इतक्या लवकर ट्रेक संपला?” असे वाटायला लागले. पुण्याहून जातांना आम्ही ट्रेनमध्ये मजा केली, गाणी, भेंड्या इ. खेळलो.
अशा रितीने आमचा १६ दिवसांचा ट्रेक संपला. कोणाला ट्रेकिंगला जाण्याची इच्छा असेल अथवा ‘युवाशक्ती’ ची शाखा नाशिकमध्ये उघडायची असेल तर युवाशक्ती (पुणे) यांची मदत होऊ शकेल.
त्यांचा पत्ता- युवाशक्ती,
३८८, नारायण पेठ,
राष्ट्रभाषा भवन, पुणे-३०,
(४११०३०), दूरध्वनी- ४५६६९६
असा आहे.
युवाशक्तीच्या औरंगाबाद व मुंबई येथेही शाखाआहेत.
हृषीकेश मेहंदळे,
राजगृह, विभागीय
आयुक्त निवास,
गोल्फक्लब रोड, नाशिक.
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